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वो अलफ़ाज़ जिन्हें पढ़कर इश्क़ को भी इश्क़ हो जाये

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कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।

कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा।

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,

हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा।

-इब्ने इंशा

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प्रेम

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