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घंटों बैठकर काम करना बना सकता है आपको ‘बुद्धू’ !

घंटों तक बैठे रहना

घंटों तक बैठे रहना – आजकल हमारी आधी से ज्‍यादा जिंदगी घर और परिवार के साथ कम और ऑफिस में डेस्‍क पर ज्‍यादा बीतती है।

सभी जानते हैं कि लगातार घंटों तक काम करना सेहत के साथ-साथ दिमाग को भी नुकसान पहुंचाता है। हाल ही में हुई एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि आलस या मजबूरी की वजह से घंटों बैठे रहने की वजह से दिमाग सिकुड़ने लगता है और इस वजह से आगे चलकर अल्‍ज़ाइमर की बीमारी हो सकती है।

इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि काम करते हुए घंटों तक बैठे रहना इंसान का बुद्धू बना सकता है।

लॉस एंजिलिस की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं ने अध्‍ययन में पाया कि घंटों तक बैठे रहना और काम करना जिससे लोगों का दिमाग सिकुड़ जाता है। इसका मतलब है कि अगर आप अपनी जिंदगी में ज्‍यादा आराम करते हैं तो आपका दिमाग सिकुड़ सकता है। इससे पहले हुए अध्‍ययनों में भी ये बात सामने आई है कि नियमित रूप से घंटों तक बैठे रहना दिल की बीमारियां, डायबिटीज़ और कई तरह के कैंसर का खतरा रहता है।

इस अध्‍ययन के दौरान विशेषज्ञों ने पाया कि आरामतलब जिंदगी से दिमाग के वो हिस्‍से प्रभावित होते हैं जहां पर याद्दाश्‍त होती है। विशेषज्ञों की मानें तो ऐसे लोगों के मस्‍तिष्‍क के मीडियल टेंपोरल लोब में ग्रे मैटर बहुत कम मात्रा में होता है। इस क्षेत्र में गिरावट से भविष्‍य में डिमेंशिया और अल्‍ज़ाइमर जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। ये अध्‍ययन प्‍लस वन जर्नल में प्रकाशित हो चुका है।

शोधकर्ताओं को इस परिणाम तक पहुंचने के लिए 45 से 75 साल के वयस्‍कों के जीवनशैली संबंधी आंकड़ों का अध्‍ययन करना पड़ा। इस रिसर्च में शामिल सभी वॉलंटियर का एमआरआई स्‍कैन करवाया गया जिसमें एमटीएल का विस्‍तृत ब्‍यौरा था। मस्तिष्‍क के इस हिस्‍से में हर छोठी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात दर्ज होती है।

इस रिसर्च की मानें तो अगर आप आराम ज्‍यादा और काम कम करते हैं तो आपका दिमाग बुद्धु बक्‍सा बन सकता है। समय से पहले ही आपकी याद्दाश्‍त कम हो सकती है और आप अल्‍जाइमर जैसी बीमारी का‍ शिकार भी हो सकते हैं।

वहीं दूसरी ओर साल 2015 में जर्नल न्‍यूरोलॉजी में प्रकाशित हुई एक स्‍टडी में यह पाया गया कि महज़ 2 सालों में सामान्‍य लोगों की तुलना में टाइप 2 डायबिटीज़ के मरीज़ों की बौद्धिक क्षमता को बहुत ज्‍यादा क्षति पहुंची थी। इसका मतलब है कि टाइप 2 डायबिटीज़ के मरीजों की याद्दाश्‍त पर इस बीमारी का बहुत असर पड़ता है। वहीं 2015 में हुई एक अन्‍य स्‍टडी में बताया गया कि डायबिटीज़ का संबंध मस्तिष्‍क में बदलाव से हो सकता है और ऐसा अल्‍जाइमर के मरीज़ों में भी देखा गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि टाइप 2 डायबिटीज़ के मरीज़ों में डिमेंशिया का दोगुना खतरा बना रहता है।

मधुमेह के मस्तिष्‍क पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर और रिसर्च की जाने की जरूरत है ताकि ये पता चल सके कि ये बीमारी दिमाग पर लॉन्‍ग और शॉर्ट टर्म में क्‍या और कितना असर डालती है।

घंटों तक बैठे रहना – दिमाग का लंबे समय तक चलना और याददास्त मजबूत रहना बहुत जरूरी है इसलिए जितना हो सके घंटो तक ना बैठे रहें और शारीरिक कार्यों पर ध्‍यान दें।

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