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बोलना भी एक कला है

बोलने की कला

बोलने की कला – बहुत सी बातों की जानकारी होने के बावजूद भी ज्यादातार लोगों को मालूम नहीं होता कि अपनी बात को कैसे प्रभावी ढंग से रखा जाए.

ऐसा संभव न हो पाने पर ऐसे व्यक्तियों के न केवल ज़रूरी कार्य प्रभावित होते हैं बल्कि अपनी बात सामने वाले व्यक्ति को न समझा पाने की वजह से वे कुंठित भी हो जाते हैं. वहीं, दूसरी तरफ वे लोग जो अपनी बात को आसानी से रखने में कामयाब होते हैं यानी बोलने की कला में माहिर होते हैं. ऐसे लोग जानते होते हैं कि अपनी बात की अहमियत दूसरे को कैसे समझानी है.

हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि हमारी बात कितनी भी अहम क्यों न हो पर जबतक हम खुद उसे उसी तरह प्रभावी तरीके से बताएंगे नहीं तबतक दूसरों की नज़रों में उस बात का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा. इसलिए ये ज़रूरी है कि जब कभी आपको अपने बॉस से किसी कार्य हेतु छुट्टी लेनी हो या अपने सहकर्मी से किसी कार्य के लिए अनुरोध करना हो, उस कार्य की गंभीरता उन्हें पूरे विश्वास से समझाने की कोशिश करें. पर ऐसा करते वक़्त हमारा रवैया बेहद पेशेवर, किंतु विनम्र होना चाहिए .

बोलने की कला

इसी के साथ अगर आपको लगता है कि आप और जिम्मेदारी उठाने के लायक हैं तो ऐसी स्थिति में आपको सकारात्मक लहज़े में ही अपने बॉस से बात करनी चाहिए. जैसे जब प्रमोशन की बात करनी हो तो अपने बॉस से आप ये कह सकते हैं कि मैं अपने कार्य को बहुत पसंद करता हूँ और साथ ही मैं चुनौतियों से भी निपटने में सक्षम हूँ. इसलिए आशा करता हूँ कि आप मुझे अमुक ज़िम्मेदारी के योग्य मानेंगे.

ये भी हर बार ज़रूरी नहीं कि आप अपने बॉस के सामने जो भी मांग रखने जा रहें हैं या सहकर्मी से किसी कार्य के लिए अनुरोध करने जा रहे हैं उसके लिए वे तैयार हो ही जाएं. आपको ऐसी स्थिति में याद रखना चाहिए कि किसी भी बात के लिए आपको ‘हाँ’ या ‘ना’ सुनना पड़ सकता है. इसलिए पहले से ही ज़्यादा उम्मीदें न पालकर किसी भी संभावना के प्रति सचेत रहने से इसके दूरगामी लाभ मिल सकते हैं. वहीं, अगर आप बिना किसी प्रतिरोध किए ‘ना’ सुनने की ताकत रखते हैं तो इस बात की ज्यादा संभावना है कि आगे आपकी बात को न केवल सुना जाएगा बल्कि गंभीरता से भी लिया जाएगा.

बोलने की कला

बात तबतक प्रभावी नहीं हो सकती जबतक कि उसे शारीरिक भाषा सहयोग न करे. इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि आपकी शारीरिक हाव-भाव भी आप जो कहना चाह रहें हों उन बातों का संचार करे. इसके साथ ही शब्दों का सही उच्चारण, आवाज़ की तीव्रता किन शब्दों पर बढ़ानी है और किन पर नहीं, इन बातों का भी ख्याल रखने की ज़रुरत है.

बोलने की कला – आपके ऑफिस-कॉलेज का पब्लिक प्रेजेंटेशन हो या फिर वन-टू-वन टॉक, आई कांटेक्ट बनाकर बात करने से भी आत्मविश्वास आता है व सामने वाले व्यक्ति पर इसका गहरा असर पड़ता है. इसके साथ ही ये समझना भी ज़रूरी है कि किसीको देर तक घूरना भी अच्छी बात नहीं. वहीं, अगर दिल साफ़ हो तो आँखों से अपने आप सच्चाई झलक जाती है. वहीं, यदि आपने अपनी बोलने की कला को विकसित कर लिया तो आपको अपने सभी कार्य बहुत ही सहज लगने लग जाएंगे. फिर आप आसानी से अपनी सभी समस्याओं और चुनौतियों का सामना करते हुए तेज़ी से आगे बढ़ सकेंगे.

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