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अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु बम फेंका जाना ‘सही या गलत’. जाने बराक ओबामा के ही लहजों में!! 

परमाणु बम

परमाणु बम – इतिहास के पन्नो में 20 वीं शताब्दी सबसे ज्यादा विध्वंसक के साथ साथ इंसान के नैतिक पतन की शुरुआत मानी जाती है, इसका कारण है वह दो विश्व युद्ध जिन्होंने दुनिया को नष्ट होने की कगार पर ला दिया था. लेकिन उस इसके साथ-साथ कुछ ऐसे वाकया भी हुए थे जिनके कारण आज का वर्तमान भी अंतर्विरोधों से झूझ रहा है.

उदाहरण के रूप में- ईरान का संकट, इजरायल-फिलिस्तीनी संकट इत्यादि.

इन सारे संकटों के पीछे कारण था ब्रिटेन का लालची रवेया और अमेरिका का खुद को श्रेष्ठ समझने का अहम्।  क्यूबा संकट के रूप में हम अमेरिका के हठी स्वभाव का बड़ी आसानी से समझ सकते हैं। अतः कह सकते हैं इन विश्व युद्धों के कारण सिर्फ २०वी सदी प्रभावित नहीं हुई थी बल्कि आज का वर्तमान भी इन्ही के कारण वीमार है।

अब बात करते हैं उस दुसरे विश्व युद्ध की जिसकी वजह से दुनिया में एक ऐसे संघर्ष की अवधारणा आई जिसमें सिर्फ कुछ ही घंटों में बड़े-बड़े युद्धों की समाप्ति की जा सके. यह दूसरा विश्व युद्ध ही था जिसमें युद्ध जीतने के लिए लौह-रक्त जैसी नीतियाँ नहीं बल्कि एक बम की रेडियोएक्टिव वाली नीति अपनाई गई।

अगर अमेरिका द्वारा जापान पर किये गए हमले का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो हमें पता चलता है कि इसमें अमेरिका के निम्न स्वार्थ थे-

  • जैसा की हम जानते हैं एशिया में जापान एक मात्र ऐसा देश था जहाँ तीव्र औद्योगिकीकरण था, चूँकि अपना बाजार बनाने के लिए जापान ने चीन के साथ दक्षिण एशिया के लगभग सभी देशों को अपना गुलाम बना लिया.
  • अमेरिका द्वारा जापान पर बिभिन्न प्रकार के अवरोध लगाये गए, किन्तु जैसे ही जापान को हिटलर का साथ मिलता है उसी समय वह अमेरिका के प्रतिवंधों को मानने से इनकार कर देता है.
  • जापान द्वारा 1905 में रूस की पराजय पश्चिम के गोर लोगों के आत्म सम्मान पर चोट थी.

परमाणु बम

चूँकि हमें यह भी मानना पड़ेगा की जिस तरह जापान ने पूरे एशिया पर अत्याचार किये शायद ही किसी और शक्ति ने इस तरह किया हो. आप इस उदाहरन से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जब जापान में परमाणु बम फेंका गया तो उस समय लाखों जापानियों के साथ साथ 40 हज़ार कोरियाई भी मारे गए, क्योंकि ये जापानी ही थे जिन्होंने कोरियाई लोगों को अपना दास बना रखा था.।

परमाणु बम

जापान और अमेरिका के बीच एक बेहद दिलचस्प बात हमें २१ वीं सदी में ओबामा के काल में तब दिखाई पड़ी जब ओबामा जापान गए और वहां के एक पत्रकार ने उनसे प्रश्न पूँछ दिया कि

“क्या आपको लगता है द्वीतीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका ने जो  जापान पर परमाणु बम फेंका था उसके लिए अमेरिका को माफ़ी मांगनी चाहिए”

इस पर बराक ओबामा ने बड़े ही आश्स्त होकर कहा “इतिहास में घटित कुछ घटनाओं के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता सही या गलत के आंकलन को भविष्य की पीढ़ी पर छोड़ देना चाहिए”

अतः बिना बहुआयामी दृष्टिकोण के इतिहास के परिवर्तनों को देखना नाकाफी है, हमें जापान का आक्रामक व्योहार तो साथ अमेरिका का क्षद्म शाश्वत मानव अधिकारों का पिटारा दोनों एक साथ खोलने की जरूरत है।

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