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ओशो का चिंतन: मुखौटों के पीछे हम

मुखौटे

मुखौटे – हर आदमी के भीतर कम-से-कम तीन व्यक्ति होते हैं.

एक तो वो, जैसा कि वो है लेकिन उसे खुद भी पता नहीं है कि वो कैसा है. एक वो, जैसा कि वो खुद को समझता है कि ‘मैं ये हूँ’. और एक वो जैसा कि वो लोगों को समझाना चाहता है कि ‘मैं ये हूँ’.

आप समझते होंगे कि आप तो बड़े विनीत हैं लेकिन भीतर अहंकार भरा होगा. आप समझते होंगे कि आप तो बहुत धार्मिक हैं पर भीतर अधर्म भरा होगा. आप समझते होंगे कि आप तो सेवावृत्ति वाले आदमी हैं लेकिन आप दूसरों से निरंतर सेवा ही लेने की इच्छा रखते होंगे.

हर आदमी को खुद को जानने के लिए बाहरी आवरण उतारने पड़ते हैं.

मुखौटे

हम ऊपर से ही कपड़े नहीं पहने हैं, मन पर भी बहुत कपड़े पहने हुए हैं. हम ऊपर से ही नग्न होने से डरते हैं, वहीं भीतर से नग्न होने से तो बहुत ज़्यादा डरते हैं. लोग बहुत घबराते हैं कि कहीं उनका कोई मौलिक रूप न देख ले. जो हम हैं, जैसे हम हैं वैसे ही न दिख जाएं. तब तो हम खुद से ही डर जाएंगे. अपने असली रूप को छिपाने के लिए लोग, बहुत सी शक्लें बना लेते हैं, मुखौटे लगा लेते हैं. यदि कोई अपने अंतःकरण को जानना चाहता है तो बाहरी मुखौटे तो उतारने ही पड़ेंगे. तब आतंरिक द्वंद्व, तकलीफें, बेचैनी व कलह से निकलने में देरी नहीं लगेगी.

सारी कलह को हमने ही खड़ा किया है. मान लो मेरे घर में एक झाड़ पैदा हो रहा है. उसके कांटें सारे घर में फैलते जा रहे हैं, लेकिन मैं रोज़ उसी झाड़ की जड़ में खाद-पानी डाल रहा हूँ. बाड़ भी लगा देता हूँ जिससे कोई जानवर इस झाड़ को न खा जाए. मैं परेशान हो जाता हूँ और लोगों से कहता हूँ कि बड़ी मुश्किल है, कांटे सारे घर में फैल रहे हैं. सुनने वाला यही कहेगा कि इसका दिमाग खराब हो गया है. ये जिसका विरोध कर रहा है, उन्हीं कांटों को रोज़ पानी दिए जा रहा है.

मुखौटे

आज हम कांटों का तो विरोध कर रहे हैं लेकिन हमें पता नहीं कि हम उसीकी जड़ों को पानी भी दे रहे हैं.

समस्या ये है कि हम अपने अंतःकरण को नहीं जानते. कांटों को हटाना चाहते हैं और जड़ों को पानी देते हैं. वहीं, जिन फूलों को लाना चाहते हैं, उनकी जड़ों को पानी नहीं देते. हम अपने अंदर अच्छे गुण लाना चाहते हैं तो उसकी जड़ों का पता नहीं लगाते. बस गुणों को चिपका लेना चाहते हैं. जो बुराइयां हैं, उन्हें कलम कर देना चाहते हैं, लेकिन उनकी जड़ों में पानी दिए जा रहे हैं. बगीचे का माली भी जानता है कि जिस पौधे की कलम की जाती है उसका झाड़ और घना हो जाता है. ऊपर से आप जिसकी कलम करेंगे, उसका झाड़ घना होने के साथ-साथ उसकी जड़ें भी मोटी हो जाएंगी. फिर तो जीवन असुविधा में, कलह में और परेशानियों में पड़ जाएगा.

शांत होने के लिए हमें बाहरी मुखौटे और अंतःकरण के सारे विरोधाभास मिटाने होंगे. असली साधना तो यही है.

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