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ध्यान के चमत्कार

ध्यान के चमत्कार

ध्यान के चमत्कार – ध्यान यानी मन का किसी एक बिंदु, वस्तु या विषय पर केंद्रित करने का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं चमत्कारिक परिणाम होता है. सच बोलना, अहिंसा, चोरी न करना, ब्रम्हाचर्य एवं अपरिग्रह नामक पांच नियम पालन करते हुए शुद्ध आसन पर बैठें. महर्षि पतंजलि के अनुसार स्थिति सुखासन होनी चाहिए.

वहीं, गीता के अनुसार कुश और वस्त्र उपरोपरी बिछाकर, देह गला और सिर एक सीध में स्थिर रखकर बैंठें. फिर हमें प्रणायाम कर इंद्रियों की वृत्तियों को समेटकर अपने मन में लीन करना चाहिए जिसे प्रत्याहार कहते हैं. ये धारणा है. नाभिचक्र, ह्रदय कमल, नासिका का अग्र भाग, दोनों भ्रकुटियों के बीच का स्थान यानी त्रिपुटी अथवा सूर्य, चंद्र, आराध्य देव इसके लिए चुने जा सकते हैं.

ध्यान के चमत्कार

ज्ञात रहे जहाँ चित्त लगाया जाए उसी से वृत्ति का एक तार चलना ध्यान कहलाता है. जैसा कि हमें मालूम है कि मन अत्यंत ही चंचल होता है. उसे एक स्थान पर ध्यान केंद्रित करने से ऊर्जा प्रस्फुटित एवं निः सृत हो जाती है. वहीं, ध्यान के लिए त्रिपुटी की बड़ी महत्ता बताई गई है. गौरतलब है कि मन अपनी 64 रश्मियों के साथ यहीं रहता है.

ध्यान के चमत्कार – ज्ञात रहे कि आज्ञाचक्र में ध्यान लगाने से साधक संपूर्ण विश्व का हितकर्ता, सारे शास्त्रों का ज्ञाता, त्रिलोक के पालन संहार करने की शक्ति वाला हो जाता है. इससे ‘उन्मनी’ तक की गति उसे प्राप्त हो जाती है. ध्यानकर्ता को आरम्भ में कोहरा, सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, जुगनू, बिजली व स्फटिक आदि बहुत से दृश्य अगर दिखाई देने लग जाएं तो इसे ध्यान की सफलता माना जाना चाहिए. इसके साथ ही अगर शरीर हल्का लगने लगे, रोग रहित होने लगे, शरीर में चमकीलापन दिखने लगे, स्वर मधुर, विषयों से निवृत्ति, देह से सुगंध निकलने लगे तो समझ लेना चाहिए की योग की पहली सिद्धि हो गई है.

ध्यान के चमत्कार

जलते हुए दीपक का प्रकाश दर्शित होना प्रायः सभी जगह वर्णित है. ध्यानस्थ योगी को पहले जलते दीपक का प्रकाश फिर प्रातः कालीन सूर्य की ज्योति का आभास होता है. सघन एवं अविरल ध्यान से जब केवल ध्येय की ही प्रतीति रह जाए तो उसे समाधि कहा जाता है.

ध्यान के चमत्कार

वहीं, चित्त की चंचलता की परीक्षा के लिए ध्यान से ज़्यादा उपयोगी कोई दूसरा साधन नहीं हो सकता. एकांत में ध्यान में बैठने पर मन इधर-उधर फिरने लग जाता है. इससे हमें ये ज्ञात हो जाता है कि हमारा मन कहां-कहां गया. जब कभी हम किसी कार्य को करने में बिल्कुल जुट जाते हैं फिर हमारा मन कहीं नहीं भटक पाता. अपने मन को जांचने का मौका ध्यान देता है. इस प्रकार हमें अपने मन के 10-20 तरह के चलचित्र को लिख लेना चाहिए. फिर इसको देखने से ये हमें पता चल सकता है कि हमारा मन सबसे ज़्यादा किन चीज़ों में लगा रहता है. एक बार इन चित्रों को पहचान लेने पर अपने मन को उधर जाने का मौका ही न दें.

ध्यान के चमत्कार – ईश्वर तो हमारे अंदर है, ह्रदय में. उस पर बुद्धि एवं ह्रदय का आवरण है. हमारी बुद्धि में ही जब गंदगी होगी तो हमें अंदर का प्रकाश भला कैसे दिखाई देगा? ये ध्यान रखें कि किसी भी कार्य के चित्त की एकाग्रता आवश्यक होती है. फिर चाहे व्यवहार हो या परमार्थ, चित्त की एकाग्रता के बिना हमें सफलता मिलनी मुश्किल हो जाती है.

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