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आज भी रोटी, कपड़ा और मकान से कैसे जूझ रहा भारत

आर्थिक सुधारवाद

आखिर क्या वजह है कि इतने वर्षों बाद भी हमारे देश में आर्थिक सुधारवाद की दिशा में कदम आगे नहीं बढ़ाए जा रहे. समाज का एक बड़ा हिस्सा इससे न केवल वंचित है बल्कि इसके दुष्प्रभावों का दंश भी झेल रहा है.

तथ्य तो ये है कि देश का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी लगभग 3.50 ट्रिलियन डॉलर है, करीब 180 लाख करोड़ रूपए. दुनिया में आज सिर्फ सात ही देश ऐसे हैं जिनकी अर्थव्यवस्था इस आंकड़े तक पहुंची है. वहीं, आज ये उतना ही सच है कि भारत मानव विकास सूचकांक में 132वें स्थान पर है. समग्र विकास की वस्तुस्थिति यही सूचकांक बताता है. फिर ये भी उतना ही सच है कि भारत इस सूचकांक में उप-सहारा अफ्रीकी देशों से निचले पायदान पर है. इससे यही निष्कर्ष निकल कर आता है कि इस तथाकथित आर्थिक विकास का लाभ समाज के हाशिए पर स्थित आखिरी आदमी तक नहीं पहुंच पाया है.

आर्थिक सुधारवाद

तकरीबन हमारे साथ ही ब्राज़ील में भी आर्थिक सुधारवाद की प्रक्रिया शुरू हुई थी लेकिन आज देखें तो ब्राज़ील में नतीजे उत्साहवर्धक हैं.

इसी बीच वहां अमीर-गरीब के बीच की खाई में भी कमी देखने को मिली. फिर आखिर भारत में कहाँ कमी रह गई? इसके लिए भारत के राज्य-अभिकरणों से रिश्ते के इतिहास पर नज़र डालनी चाहिए. केवल आर्थिक सुधारवाद के प्रणेताओं को कोसने से काम नहीं चलेगा. ये सच है कि पिछली सरकार ने रोज़गार के लिए मनरेगा, शिक्षा के लिए सर्व शिक्षा अभियान एवं ग्रामीण स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थय मिशन शुरू किए. वहीं, मौजूदा सरकार ने कुपोषण रोकने हेतु खाद्य सुरक्षा बिल पास करवाया.

आर्थिक सुधारवाद

आज मनरेगा की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है. दस साल पहले दुनिया छोड़ चुके लोगों के नाम पर कागज़ों पर नहर बनाने का कारनामा कर राज्य सरकारों का पैसा लोग लूटते रहे. ओडिशा में आई सीएजी की रिपोर्ट इस बात की तस्दीक देती है. इसी तरह ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की परिणति घोटाले के रूप में हम उत्तर प्रदेश में पहले ही देख चुके हैं. सर्व शिक्षा अभियान किस तरह भ्रष्टाचार की दहलीज़ पर दम तोड़ता हुआ नज़र आ रहा है ये भी गैर सरकारी लेकिन विश्वसनीय संगठन ‘असर’ की रिपोर्टों में पढ़ा जा सकता है. यहां पर आज प्रश्न उस विश्वास के संकट का है जो जनता और सत्ताधारियों के बीच गहरे तक घर कर चुका है.

आर्थिक सुधारवाद

दरअसल उदारवादी अर्थव्यवस्था की सफलता की पहली शर्त यही है कि डीलिवरी तंत्र को पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त करना. इसके लिए ज़रूरी है कड़े कानून और मज़बूत कानूनी अभिकरण. देखा जाए तो आज के वर्तमान समय में हमारे देश में इन दोनों का अभाव है. वहीं, दिक्कत ये भी आ जाती है कि इस बार के चुनावों को छोड़कर अक्सर चुनावों में किसी एक दल के बहुमत का न हो पाना. प्रायः ऐसी स्थितियों में मुख्य दल को मजबूरन ही गठजोड़ की हुई पार्टियों के इशारों पर चलना पड़ता है.

भारत का जनमानस आज पूरे गौरव के साथ अपने देश को प्रगति की राह पर ले जाना चाहता है. उसके अंदर कमाल की इच्छाशक्ति है पर ज़रूरत है तो सिर्फ एक दिशा देने की. अगर उनके प्रयासों को दिशा मिल जाए तो देश को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित नहीं रहना पड़ेगा.

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