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प्राचीन काल से चलता आ रहा है भारत में भ्रष्टाचार 12वी शताब्दी के शिलालेख में है जिक्र

भारत में भ्रष्टाचार

भारत में भ्रष्टाचार – इस बात में कोई शक नहीं है कि आज भारत की जड़ों तक भ्रष्‍टाचार की पहुंच हो चुकी है।

आपको लगता होगा कि कलियुग में ही भ्रष्‍टाचार पैदा हुआ है क्‍योंकि पहले के युगों में तो लोग बहुत ईमानदार होते थे और हर काम को पूरी ईमानदारी के साथ किया करते थे लेकिन ये सत्‍य नहीं है।

आपको बता दें कि भारत में भ्रष्टाचार प्राचीन समय से ही मौजूद है और इस बात का सबूत देती हैं प्राचीन शिलालेख।

आइए जानते हैं विस्‍तार से पूरी खबर – भारत में भ्रष्टाचार की !

बिहार में जहां चारा और शौचालय घोटाले जैसे बड़े भ्रष्‍टाचार जैसे काम हुए हैं वहीं इस धरती पर कुछ ऐसे शिलालेख मिले हैं जिनमें रिश्‍वत लेने का उल्‍लेख व परंपरा के बारे में लिखा हुआ है। बिहार के रोहतास से मिले ताराचंडी में ये शिलालेख मिले हैं।

भारत में भ्रष्टाचार

12वीं शताब्‍दी के हैं शिलालेख

बताया जा रहा है कि ये शिलालेख 12वीं सदी के खरवार के राजा महानायकप्रतावधवलदेव द्वारा अपने पुत्र शत्रुघ्‍न के माध्‍यम से 212 सेमी लंबे और 38 सेमीचौडेपत्‍थर पर लिखवाया गया था। ये शिलालेख ताराचंडी देवी प्रतिमा के बगल में स्थित है।

इस शिलालेख में राजा द्वारा रिश्‍वत लेने का वर्णन किया गया है। राजा के अधिकारियों के रिश्‍वत लेकर गांव को पाने की मंशा के बारे में उल्‍लेख किया गया है। राजा के अधिकारियों ने एक ताम्रपत्र से राजा के जाली हस्‍ताक्षर करके ये सब काम किया था। इसकी जानकारी खुद राजा को नहीं थी लेकिन जैसे ही उन्‍हें इस षड्यंत्र का पता चला तो उन्‍होंने इसे ताम्रपत्र को ही रद्द कर दिया।

1169 का है ये शिलालेख

ताराचंडी में मिले इस शिलालेख में प्रताप धवल देव को जपिलपति कहा गया है। आपको बता दें कि ये शिलालेख संस्‍कृत में लिखा गया है। इसमें लिखा है ‘ऐश्‍वर्य शाली देव स्‍वरूप प्रताप धवल जिनकी कीर्ति चारों ओर फैली हुई है, अपने वंशजों से कहते हैं कलहंडी के समीप के गांव सुवर्णहल के विप्रो द्वारा छदनाम से रिश्‍वत देकर शासक के बेईमान दासो से जो दोषपूर्ण ताम्रपत्र प्राप्‍त किया जाता है। आज इस जगह को शिवसागरप्रखंड के सोनहार गांव के नाम से जाना जाता है।

अब कहां है ये ताम्रपत्र

सोनहर से मिले इस ताम्रपत्र को पटना संग्रहायल में रखा गया है। इसमें वर्णन है कि उस समय के कन्‍नौज के राजा वियजचंद्र जो कि काशी में शासन करते थे उनके दो विप्रो ने बरैला और सोनहर गांव को दान में दे दिया था। यह राज्‍यादेश पर लिखा गया था लेकिन उस ताम्रपत्र को प्रतावधवलदेव ने झूठा और जालसाजी घोषित कर दिया था और उन गांवों से अपना दावा छोड़ने से इनकार कर दिया था।

भारत में भ्रष्टाचार – प्राचीन समय में हुई ये घटना बेहद शर्मनाक है क्‍योंकि उस दौर में राजा से बेईमानी करने का मतलब था देशद्रोह। साथ ही इस घटना से ये भी पता चलता है कि प्राचीन समय में भी भ्रष्‍टाचार हुआ करता था और इसकी नींव पुराने समय में ही रखी गई है। तो इस तरह आप भारत में भ्रष्‍टाचार को अपने पूर्वजों का तोहफा कह सकते हैं। ये घटना हम सभी को हैरान कर देती है।

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