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जब इस कपल ने कोर्ट के सामने रखी इच्छा मृत्यु की मांग !

इच्छा मृत्यु की मांग – भारत देश में रोज कई तरह के केस होते रहते हैं। जो कई बार जनता को चौंका देते हैं और यहां तक कि सरकार को भी।

ऐसा ही एक केस आया था इच्छा मृत्यु का। जिसने जनता को ही नहीं बल्कि सरकार भारतीय संविधान को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।

आपने निश्चित ही इच्छा मृत्यु के बारे में सुना होगा, इच्छा मृत्यु का मतलब होता है अपनी इच्छा से खुद की मृत्यु को चुना जाना। इसी संदर्भ में एक अंग्रेजी कानून के अनुसार भारत में आत्महत्या करना गैरकानूनी होता था अगर आत्महत्या करते समय अगर आप बच जाते हैं तो आपको अपनी बची हुई जिंदगी जेल में काटनी होती थी।

अगर आपने ‘दी सी इनसाइड’ फिल्म देखी हो तो उसमें एक लकवाग्रस्त नायकहोता है, वह अपनी जिन्दगी से इतना परेशान हो जाता है कि उसके मन में आत्महत्या का ख्याल आ जाता है लेकिन अक्षम होने के कारण वह अपनी कल्पना में ही आत्महत्या के उद्देश से उठता है और जैसी ही खिड़की से जम्प लगता है तो वह हवा में उड़ने लगता है।इससे हमें यह पता चलता है कि वह अपनी भयानक पीड़ा से मुक्त होना चाहता था, आखिर में उसे जिन्दगी की खुशी समझ में आने लगती है।

यूथेनेसिया या इच्छा मृत्यु के पक्ष में संवैधानिक तौर पर कहें तो संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार हर व्यक्ति को अपना जीवन गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। इच्छा मृत्यु के संदर्भ में भारत में अरुणा शानबाग बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में पहली बार इच्छा मृत्यु का मुद्दा सार्वजनिक चर्चा में आया था इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने की इच्छा मृत्यु की मांग की याचिका स्वीकार करते हुए मेडिकल पैनल गठित करने का आदेश दिया था हालांकि बाद में न्यायालय ने अपना फैसला बदल दिया था लेकिन इस फैसले से पीड़ित व्यक्ति को इच्छा मृत्यु देने की बहस को आगे बढ़ाने का कार्य किया। आपको बता दें कि भारत के साथ दुनिया के कई देशों जैसे- नीदरलैंड, बेल्जियम आदि में इच्छा मृत्यु की अनुमति नहीं है।इन देशों में इच्छा म्रत्यु के लिए कुछ स्पेशल कायदे कानून बनाए गए हैं।

इच्छा मृत्यु की मांग के पक्ष में खड़े हुए लोगों का तर्क है कि व्यक्ति के शरीर पर केवल उसका अधिकार है यदि बीमारी के कारण व्यक्ति का दर्द सहन शक्ति की सीमा से ऊपर जा चुका है तो उस व्यक्ति को मृत्यु के जरिए दर्द से मुक्ति पाने का अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए। वही इच्छा म्रत्यु का विरोध करने वालों का कहना है कि जीवन ईश्वर की देन है इसलिए से वापस आने का हक उसी को है।इसमें एक मजबूत पक्ष ये भी है कि इसे कानूनी मान्यता प्रदान करने के बाद मामले बढ़ जाएंगे ऐसे पारिवारिक रंजिश के चलते लोग आसानी से अपना रास्ता साफ कर पाएंगे।

महाराष्ट्र के लावते दंपत्ति के अलावा एनजीओं ‘कॉमन कॉज’ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है उसी तरह उन्हें मरने का अधिकार है। लेकिन केंद्र सरकार का मानना है कि  वसीयत लिखने की अनुमति नहीं दी जा सकती हालांकि मेडिकल बोर्ड के निर्देश पर मरणासन्न व्यक्ति का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है।

एक्टिव पैसिव यूथेनेशिया के बारे में बता दे तो यह वह कंडीशन है जब किसी व्यक्ति को किसी जहरीले इंजेक्शनसे उसकी मृत्यु में सहायता दी जाती है जबकि यूथेनेसिया में व्यक्ति को बचाने के लिए कोई सहायता नहीं दी जाती।

इच्छा मृत्यु की मांग – भारतीय संस्कृति में जीवन रक्षा की परंपरा रही है अब देखना यह है कि आखिर कोर्ट इस संबंध में क्या डिसीजन लेता है।

Kuldeep Dwivedi

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