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जिस मखमली कालीन पर दुनिया है फ़िदा उसे बनाने वाले रोटी को मोहताज़ हैं

मखमली कालीन

मखमली कालीन – घरों को सुंदर दिखने के लिए आप भी कारपेट बिछाते होंगे.

मॉल या बाज़ार से महंगे कारपेट आपके घरों में आते हैं और घर की शोभा बढ़ाते हैं. ये कारपेट जहाँ बिछ जाते हैं वहां की सुंदरता अपने आप बढ़ जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन कारपेट्स को बनाने वाले आज भी उतने ही गरीब हैं जितने की पहले हुआ करते थे.

कारपेट हिंदी में इसको कालीन कहते हैं. वाही मखमली कालीन जिसे आप फर्श पर बिछाते हैं. फर्श पर बिछते ही ये घर की शोभा बढ़ाने के साथ ही आपके बच्चों की सुरक्षा भी करता है. जब बच्चे छोटे हैं और चलना सीखते हैं तो वो इसी मखमली कालीन पर गिरते हैं और उन्हें चोट नहीं आती.

फर्श की चोट से आपको बचाने वाले इस मखमली कालीन को बनाने वाले आज भी किस्मत की चोट खाते हैं.

उनकी बनाई मखमली कालीन लाखों में बिकती है जबकि उनके लिए दो जून की रोटी तक नसीब नहीं होती. जिस तरह से भदोही (उत्तर परदेश) की कालीन दुनिया में फेमस है उसी तरह से झारखंड के झारखंड के गिरिडीह जिले का गांडेय प्रखंड कालीन उद्योग के केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है. यहाँ के लोग भी कालीन बनाते हैं.

यहाँ के लोग जो कालीन बनाते हैं उसे विदेश के बाज़ार में बेचा जाता है.

लोहारी और पुतरिया जैसे गांवों में दर्जनों बुनकर परिवार कालीन निर्माण में जुटे हुए हैं. यहां के कारीगर कालीन बुनने के बाद उसे राजस्थान भेजते हैं. राजस्थान से धुलाई और डिजाइनिंग कर इसे यूरोप, सऊदी अरब, आस्ट्रेलिया तक निर्यात किया जाता है. वहां पर ये महंगे दामों में बिकते हैं. आपको इतना बता दें की सादे कालीन की कीमत भी 50 हज़ार से शुरू होती है. अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कितनी महंगी ये कालीन बिकती होगी.

लाखों में बिकने वाली ये कालीन की कीमत के असली हक़दार वो मजदूर हैं जो दिन रात मेहनत करके सुंदर डिजाईन के कालीन बनात्ते हैं.

आपको जानकर हैरानी होगी कि यही मजदूर अपनी इस कला से दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते.

एक कारीगर को लगभग सात हजार रुपये की आमदनी हो पाती है, इसलिए कई बुनकरों को परिवार चलाने के लिए अन्य काम भी करने पड़ते है. इसकी बुनाई करने पर मजदूरों को महज़ कुछ हज़ार रूपए ही मिलते हैं. इसमें उनके घर का खर्चा चलना मुश्किल होता है.

मतलब जो काम ये मजदूर करते हैं वो उनके परिवार का पालन भी नहीं कर सकती. ऐसे रोज़गार से क्या फायदा. बेहतर तो यही हो को मजदूर कोई और काम कर लें. मजदूरों को जब अपने घर का खर्च चलाने के लिए किसी और काम पर निर्भर रहना ही पड़ता है तो इससे बेहतर की वो फुल टाइम ही कोई और काम खोज लें.

मखमली कालीन बुनने वाले मजदूरों के बारे में सरकार को सोचना चाहिए, क्योंकि जिसके कारखाने में ये कालीन बुनी जाती है वो तो बड़े बड़े सेठ होते हैं जिन्हें मजदूरों का खून पीना अच्छा लगता है. वो कभी उनके बारे में नहीं सोचेंगे.

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