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सफ़ेद रंग को दुलहन के लिए अशुभ क्यों माना जाता हैं?

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हम सभी लोग अपने बुजुर्गों द्वारा बनायीं गयी परंपरा और रीति रिवाज़ों का कई बार किसी मंद् बुद्धि व्यक्ति की तरह पालन करते हैं और उसके पीछे के तथ्य और वजह जानने का प्रयास भी नहीं करते हैं.

हिन्दू धर्म से जुडी कई मान्यताओं के बारे में जानकारी के लिए हमेशा यही कहा जाता हैं कि ऐसी बात की सत्यता की जाँच करने के लिए ग्रन्थ और धार्मिक किताबों में नज़र दौड़ायें तो ऐसी सभी बात के विषय में तथ्य मिल जायेंगे लेकिन इस बात का कही कोई प्रमाण नहीं हैं कि सफ़ेद रंग को ख़ुशी के आयोजन में अशुभ या वर्जित क्यों माना गया हैं?

अक्सर देखा गया हैं कि यदि किसी व्यक्ति की शादी हो रही हो या ऐसा कोई आयोजन हो रहा हो जो खुशियों से जुड़ा हैं तो वहां सफ़ेद कपड़े पहन कर जाने से मना करते हैं या हिन्दू विवाह में दुल्हन को सफ़ेद रंग पहने से मना किया जाता हैं, और इसके पीछे वजह यह कही जाती हैं सफ़ेद रंग अशुभ का प्रतीक माना जाता हैं.

यदि कोई स्त्री विवाह के बाद स्वेत रंग में गृहप्रवेश करती हैं इसे सही संकेत नहीं कहा जाता हैं.

रंगों की बात करे तो सफ़ेद रंग को निर्मलता और स्वचछता का प्रतीक माना जाता हैं, वही लाल रंग को उर्जा का प्रतीक माना जाता हैं. परन्तु सफ़ेद रंग के अशुभ होने की बात कही भी किसी भी किताब में नहीं कही गयी हैं, तो यह तर्क देना पूरी तरह निराधार हैं कि शादी में दुल्हन को सफ़ेद रंग नहीं पहना चाहिए.

दरअसल सफ़ेद रंग को निर्मलता और स्वचछता के रूप में देखा जाता हैं और जिस स्थान में इतनी साफ-सफाई और निर्मलता होती हैं वहा माँ लक्ष्मी का वास होता हैं  फिर इस रंग से इतना परहेज क्यों?

इन बातों के अलावा भारत देश में कई ऐसे समुदाय हैं जहाँ सफ़ेद रंग को शुभ माना गया हैं.

इन सारे समुदायों में विवाह के समय भी दुल्हन के साथ किसी न किसी तरह से सफ़ेद रंग का इस्तेमाल किया जाता हैं, चाहे वह साड़ी के तौर पर हो या सर पर रखने वाले दुपट्टे के रूप में हो.

इसलिए सफ़ेद रंग की अशुभ कहना पूरी तरह से अनर्गल बात कही जा सकती हैं.

इसी तरह अनामिका उंगली के इस्तेमाल के पीछे भी यहाँ कहा जाता हैं कि इस उंगली पर भगवान् शिव का वास माना  जाता हैं.

कहते हैं एक बार भगवान शिव ने ब्रह्मा जी के पांचवें सर को अपने हाथ से अलग किया था लेकिन भगवान शिव के हाथों की अनामिका उंगली इस हिंसा से दूर थी इसलिए इस उंगली को अनामा यानि जो सबसे पवित्र मानी गयी और इसे अनामिका कहा जाने लगा.

खैर ऐसे बहुत सी रीति रिवाज़ और परम्पराएं कई सालों से चली आ रही हैं जिसके पीछे कोई तर्क कोई औचित्य नहीं हैं वह पूरी तरह बेबुनियाद हैं पर फिर भी घसीट रही हैं.

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