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आखिर क्यों हिंदुस्तान की रोटी खाकर पाकिस्तान की बोली बोलते हैं फारूक अब्दुल्ला !

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला आए दिन कश्मीर को लेकर दिए गए विवादित बयानों के चलते सुर्खियों में बने रहते हैं.

फारूक अब्दुल्ला ने हर बार अपने विवादित बयानों से यह साबित किया है कि वो भले ही रहते हिंदुस्तान में हैं और रोटी हिंदुस्तान की खाते हैं लेकिन उनका दिल हमेशा पाकिस्तान के लिए ही धड़कता है.

हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जब-जब बात भारत और पाकिस्तान को लेकर होती है फारूक साहब के मुंह से भारत के खिलाफ पाकिस्तान वाली बोली ही सुनने को मिलती है.

हालांकि फारूक अब्दुल्ला इस बात को कबूल भी कर चुके हैं कि उनके पूर्वज कश्मीरी पंडित थे. बावजूद इसके वो पाकिस्तान का ही गुणगान करते नजर आते हैं.

हद तो तब हो गई जब उन्होंने यह बयान दिया कि कश्मीर को पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से नहीं बल्कि देश के हिंदू संगठन आरएसएस से है. चलिए हम आपको इस लेख के जरिए बताते हैं फारूक अब्दुल्ला के वो विवादित बयान जो उन्होंने पाकिस्तान के हित में और भारत के खिलाफ दिए हैं.

कश्मीर को लेकर फिर बिगड़े फारूक अब्दुल्ला के बोल

फारूक अब्दुल्ला ने हाल ही में पोओके यानी पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर विवादित बयान दिया है. अपने बयान में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने चूड़ियां नहीं पहन रखी है और वो इतना कमज़ोर भी नहीं है कि अपने कब्जेवाले कश्मीर पर भारत का कब्जा होने देगा.

आखिर भारत यह कब तक कहता रहेगा कि पोओके हमारा है जबकि उसपर पाकिस्तान का अधिकार है. पिछले 70 सालों से भारत इसपर अपना अधिकार जमाने में लगातार असफल रहा है.

फारूक अब्दुल्ला ने कड़े शब्दों में कहा कि पीओके पर अधिकार जमाने के लिए अगर भारत-पाकिस्तान में युद्ध भी हो जाए तब भी भारत पाकिस्तान से पाक अधिकृत कश्मीर वापस नहीं ले सकता क्योंकि उसपर पाकिस्तान का ही अधिकार रहेगा.

कश्मीर के लिए आरएसएस है सबसे बड़ा खतरा

डॉ. फारूक अब्दुल्ला की मानें तो कश्मीर को पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से नहीं बल्कि आरएसएस से खतरा है, क्योंकि पाकिस्तान के पास इतना दम नहीं कि वो हमें अपने अधिकार में ले सकेगा.

उन्होंने कहा कि कश्मीर को सबसे ज्यादा किसी से खतरा है तो अपने ही मुल्क के सबसे बड़े हिंदू संगठन आरएसएस से है. क्योंकि देश में हिंदुओं और मुसलमानों पर होनेवाले हमले और गौरक्षकों पर होनेवाले हमलों के पीछे आरएसएस का ही हाथ है.

उन्होंने आरएसएस पर निशाना साधते हुए कहा कि आरएसएस तो पूरे देश में ऐसी आग लगा रही है जिससे भविष्य में ना जाने कितने पाकिस्तान बनेंगे.

उनकी भड़ास यहीं पर खत्म नहीं हुई कश्मीर में चरमपंथियों का साथ देने के लिए मजबूर होनेवाले युवाओं के पीछे भी उन्होंने  केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है. उनके मुताबिक केंद्र सरकार कश्मीरियों को जितना दबाएगी उनके अंदर आक्रोश की आग उतनी ही तेजी से बढ़ती जाएगी.

डॉ. अब्दुल्ला ने माना कि उनके पूर्वज हिंदू पंडित थे

मुस्लिम कॉन्फ्रेंस यानी नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक और फारूक अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला ने अपनी पुस्तक ‘आतिशे मीनार’ में ना सिर्फ अपनी आत्मकथा को विस्तार से बयान किया है बल्कि इस हकीकत को भी स्वीकार किया है कि कश्मीरी मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे.

श्रीनगर के पास सूरह नाम की एक बस्ती में जन्म लेनेवाले शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के पूर्वज सप्रू गोत्र के कश्मीरी ब्राह्मण थे और उनके परदादा का नाम बालमुकुंद कौल था.

बताया जाता है कि अफग़ानों के शासनकाल में उनके एक पूर्वज रघूराम ने एक सूफी संत के हाथों इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था जिसके बाद ये मुसलमान कहलाए.

शेख अब्दुल्ला के पुत्र डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने खुद कई बार अपने भाषणों और बयानों में ये स्वीकार किया है कि उनके पूर्वज हिंदू थे.

घाटी में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का देखते रहे तमाशा

भारत के विभाजन के तुरंत बाद 24 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कबाइलियों के साथ मिलकर आक्रमण कर दिया और कई दिनों तक कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार किए गए.

इस भयंकर नरसंहार में करीब 6000 कश्मीरियों का कत्ले आम कर दिया गया जबकि 750000 कश्मीरी पंडित अपना घर छोड़कर वहां से पलायन करने पर मजबूर हो गए. कश्मीर में रहनेवाले 600 कश्मीरी पंडितों के गांवों को इस्लामी नाम दे दिया गया.

आपको बता दें कि कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन करने से पहले वहां हिंदुओं के करीब 430 मंदिर थे. लेकिन अब यहां सिर्फ 260 मंदिर ही सुरक्षित बचे हैं जिनमें से 170 मंदिर खस्ताहाल हो गए हैं.

यहां हैरत की बात तो यह है कि जिस तरह से आज डॉ. अब्दुल्ला पाकिस्तान की बोली बोल रहे हैं ठीक उसी तरह इस नरसंहार के दौरान कश्मीर के सबसे लोकप्रिय संगठन नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला भी बिल्कुल मौन थे और देश की तथा कथित धर्मनिरपेक्ष सरकार मूकदर्शक बनकर इस नरसंहार का तमाशा देखती रह गई.

बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं है कि कई मौकों पर फारुक अब्दुल्ला ने अपने पूर्वजों के हिंदू होने की बात स्वीकार की है. उनके इन बयानों से यह कहना गलत नहीं होगा कि अपनी ही सरजमीं पर रहकर अपने ही वतन के खिलाफ जह़र उगलने वाली डॉ. अब्दुल्ला की यह बोली उनकी ओछी राजनीति का एक हिस्सा है ना कि घाटी के मुसमानों के प्रति उनका प्यार.

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