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उत्तराखंड के गांव क्यों होते जा रहे है वीरान, जानिए क्या कहती है रिपोर्ट

उत्तराखंड

उत्तराखंड का नाम ज़बान पर आते ही हमारे मस्तिष्क में वहाँ की ख़ूबसूरत वादियों की तस्वीर उभर आती है। वहाँ के पहाड़, हरियाली, ठंढक लिए सुहावना मौसम, नैनीताल और फूलों की वादियाँ उत्तराखंड की खूवसूरती  में चार चाँद लगातें है। पहाड़ी गाँवों के सीधे-साधे खेती-किसानी में व्यस्त अपना जीवन बसर करते मेहनतकश लोग और बहुत कुछ।

आखिर अब ऐसा क्या हो गया है कि ये खूबसूरत पहाड़ों के गाँव वीरान होन लगें हैं, लोग क्यों गाँव छोड़कर कहीं और बसने को मजबूर होते जा रहें है। पहाड़ों की गोंद में बसे हरियाली ओढ़े ये गाँव अब क्यों भुतहे गाँवों की श्रेणी में आने को विवश हैं। वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड राज्य में भुतहे यानी वीरान हो चुके गाँवों की संख्या 968 थी, जिनकी संख्या इस वर्ष बढ़कर 1668 हो चुकी है। उत्तराखंड में पिछले 7 वर्षों में 700 से अधिक गाँव खाली हो चुकें हैं। अगर बात संख्या में की जाय तो पिछले 10 सालों में 3.83 लाख लोगों ने आपना गाँव छोड़ चुकें हैं।

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उत्तराखंड के गाँवों के लोग क्यों पलायन कर रहें हैं, इसकी तह में जाने से पहले हम जान लेते हैं कि यह जानकारी एक सरकारी रिपोर्ट के माध्यम से सामने आयी है। राज्य के ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग के अध्यक्ष एसएस नेगी ने यह रिपोर्ट मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की उपस्थिति में पेश की। उन्होनें बताया कि गाँव से पलायन करने वाले लोगों में 70 प्रतिशत लोग राज्य के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में चले गये हैं। 29 फीसद राज्य से बाहर और एक फीसद विदेश पलायन कर गए. यह पिछले दस वर्षों के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट हैं जिसे मुख्यमंत्री ने अपने आवास से जारी किया है।

राज्य के पाँच जिलों की हालत खराब बतायी जा रही है।

डॉ. एसएस नेगी द्वारा प्रदेश के 7950 गांवों के सर्वे के आधार पर तैयार की गई है और रिपोर्ट पर आयोग के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अनुमोदित भी किया है।

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अह बात कारणों की आती है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में पलायन हो क्यों रहा है। रिपोर्ट में बात सामने आयी है कि 50 प्रतिशत लोगों ने आजीविका के लिए गांव छोड़ा, जबकि 73 प्रतिशत ने बेहतर शिक्षा के उद्देश्य से, इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधा के अभाव के चलते करीब 10 प्रतिशत लोग पलायन को मजबूर हुए हैं।

इतनी बड़ी संख्या में पलायन के तीन मूलभूत कारण रहें हैं। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था। रिपोर्ट पेश करते हुए मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि सरकार ने शिक्षा का स्तर उठाने के लिए कई कदम उठाए हैं। विद्यालयों में एनसीईआरटी की पुस्तकें लागू करना इनमें से एक प्रमुख कदम है। इससे न शिक्षा का स्तर ऊंचा उठेगा बल्कि विद्यार्थियों को एक समान शैक्षिक पाठ्यक्रम का अवसर भी मिलेगा। समय रहते सुधार को लेकर मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया।

ग्रामीण लोगों के पलायन में चिकित्सा सुविधाओं की कमी का होना एक प्रमुख कारण है। चिकित्सा क्षेत्र में सुधार को लेकर कहा कि एक वर्ष पहले जितने डॉक्टर प्रदेश में थे, उससे कहीं अधिक चिकित्सक इस वर्ष में नियुक्त किए गए हैं। सरकार चिकित्सा के क्षेत्र में सुधार को लेकर प्रतिबद्ध है, कई नये प्रयास जारी हैं।

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राज्य और केंद्र सरकार की कई महत्वाकांक्षी योजनाओं के बाबजूद गाँवो मे बेरोजगारी के कारण भारी संख्या में पलायन हुआ है। यहा संख्या संपूर्ण पलायन का 50 प्रतिशत है। मुख्यमंत्री ने कहा कि पं.दीनदयाल उपाध्याय सहकारिता किसान कल्याण योजना के एक वर्ष से भी कम समय के भीतर सकारात्मक परिणाम आ रहे हैं। आजीविका मिशन, मुद्रा योजना, स्टार्टअप प्रोग्राम जैसे कार्यक्रमों का लाभ जल्द ही दिखना शुरू होगा। मख्यमंत्री ने कहा कि सरकार द्वारा हाल में  लागू की गई पिरूल नीति से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 60 हज़ार लोगों को रोजगार प्राप्त होगा। पिछले साल की उत्तराखंड की त्राशदी का भी योगदान कुछ न कुछ जरूर है।

इन नीतियों का प्रभाव कब देखने को मिलेगा यह प्रश्न का विषय बना हुआ है। सरकार को चाहिए कि इस समस्या से निपटने के लिए फौरी उपाय करे, ताकि कोई नई समस्या न खड़ी हो सके।

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