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मोहब्बत हो गयी बंद! भैया पेड़ न काटो और!

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एक ज़माना था जब आशिक़ी के तय अड्डे हुआ करते थे|

बच्चे खेलें न खेलें, यूँ लगता था कि सरकार ने बाग़-बाग़ीचे सिर्फ मोहब्बत करने वालों को ध्यान में रख कर बनाये हैं| पेड़ों के झुरमुठ, कहीं-कहीं किसी कोने में बेंच ताकि हर किसी को छुप-छुप के अकेले में प्यार की गुटरगूं करने का मौक़ा मिल सके|

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पर अब वक़्त बदल चुका है|

शहरों में आशिक़ी के नज़ारे अब कम ही देखने को मिलते हैं|

या यूँ कहिये कि आशिक़ी होती तो है लेकिन उन दिनों की तरह नहीं| पेड़ कटते जा रहे हैं, पार्कों पर कब्ज़ा कर उन पर इमारतें खड़ी हो रही हैं| सिर्फ इमारतें ही नहीं, उन पर शॉपिंग मॉल बनाये जा रहे हैं| तो बेचारे आशिक़ अब कहाँ जाएँ? इसीलिए वो आम तौर पे नज़र आते हैं माल्स में हाथ में हाथ डाले घुमते हुए, किसी सिनेमा हॉल के अंधियारे में कोने की कुर्सियां ढूँढ़ते हुए या कुछ भी मुमकिन न हुआ, तो ऑटो-टैक्सी की सीट पर कुछ यादगार लम्हे गुज़ारते हुए|

उदास हो गए न आप भी?

यहाँ भी यही हाल है| ख़याल आता है कि पेड़ों का असर मोहब्बत पर हुआ या मोहब्बत का असर पेड़ों पर? अब देखिये, पेड़ कट चुके और हर तरफ एक पत्थर का शहर नज़र आता है| वहीँ दिलों का हाल भी कुछ जुदा नहीं है| सब के सब मानों पत्थर के ही हुए जा रहे हैं| एक घंटे में प्यार होता है, चौथे घंटे दिल टूटता है और छठे घंटे में दिल फिर कहीं रंगीन चोगा पहन लेता है| यही प्रक्रिया दिन में चार बार होती है और “लव” जैसे शब्द के चार अक्षर दिन में चार बार अपना रूप बदल लेते हैं!

तो दोस्तों, यह तो नहीं जानते कि हरियाली के लौट आने से दिलों में एक नयी ज़िन्दगी लौटेगी या नहीं,पर इतना तो तय है कि हमारी ज़िन्दगी में साँसें कुछ और बढ़ जाएंगी|

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और जब साँसें बढ़ेंगी तो जायज़ सी बात है कि इन्सान का वक़्त मोहब्बत करने में बीता करेगा| जब मोहब्बत के लिए वक़्त होगा, इच्छा होगी तो हरे-भरे बाग़-बाग़ीचे किस दिन काम आयेँगे?

इसी बात पर थोड़ी मेहनत कीजिये, अपने आस-पास पेड़ पौधे लगाईये और ज़िन्दगी में इश्क़-मोहब्बत कि हरियाली लाईये!

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