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ये वो भारतीय पायलट है जो पाकिस्तान को चकमा देकर जेलों से भागे थे

पाकिस्तान को चकमा देकर जेलों से भागे

पाकिस्तान को चकमा देकर जेलों से भागे पायलट – बहुत कम लोगों को यह बात पता होगी कि भारतीय वायु सेना के पायलटों ने पाकिस्तान को चकमा देकर वहां के युद्धबंदी कैंप से भाग निकले थे.

13 अगस्त, 1972 को रावलपिंडी के युद्धबंदी कैंप से पाकिस्तान को चकमा देकर जेलों से भागे पायलटों के नाम है दिलीप पारुलकर, मलविंदर सिंह गरेवाल और स्क्वाड्रन लीडर धीरेंद्र जाफा.

पाकिस्तान को चकमा देकर जेलों से भागे

दिलीप परुलकर

पाकिस्तान को चकमा देकर जेलों से भागे

मलविंदर सिंह गरेवाल

धीरेंद्र जाफा

बात 1972 की है जब भारत और पाकिस्तान के बीच बांग्लादेश को लेकर युद्ध चल रहा था. इस दौरान फ्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप पारुलकर का एसयू-7 युद्धक विमान, 10 दिसंबर, 1971 को मार गिराया गया. इसी प्रकार एक ओर पायलट स्क्वाड्रन लीडर धीरेंद्र जाफा का विमान भी दुर्घटनाग्रस्त हो गया. ये सब पाकिस्तान की सीमा में गिरे जहां इन्हें बंदी बनाकर जेल की कोठरी में बंद कर दिया गया.

जब उन्हें टॉयलेट जाना होता तो उनके मुंह पर तकिये का गिलाफ लगा दिया जाता ताकि वो इधर उधर देख न सकें. एक दिन पायलट जाफा को उसी बिल्डिंग के एक दूसरे कमरे में ले जाया गया. जैसे ही वो कमरे के पास पहुंचे, उन्हें लोगों की आवाजें सुनाई देने लगीं. ये आवाजे उन पायलटों की थी जो जाफा की ही तरह पाकिस्तान की कैद में थे.

अलग अलग रैंक के 12 भारतीय पायलट पाकिस्तान की जेल में कैद थे. इन पायलटों ने ही इन तीनों पायलटों को जेल ने निकल भागने की दुस्साहसी योजना में मदद की.

दरअसल, भारत की नीति नियोजन समिति के अध्यक्ष डीपी धर ने युद्ध के बाद पाकिस्तान का दौरा किया और वापस लौट गए, लेकिन उनकी यात्रा में इन युद्धबंदियों के भाग्य का कोई फैसला नहीं हुआ. इससे उनके मन में निराशा घर करने लगी. लेकिन जल्द ही वे इससे उबर गए और जेल से बाहर निकलने की योजना बनाने लगे. बाहर भागने की उनकी इस योजना में उनके साथी थे- फ्लाइट लेफ्टिनेंट गरेवाल और हरीश सिंह.

तय हुआ कि सेल नंबर 5 की दीवार में 21 बाई 15 इंच का छेद किया जाए जो कि पाकिस्तानी वायु सेना के रोजगार दफ्तर के अहाते में खुलेगा और उसके बाद 6 फुट की दीवार फलांग कर वो माल रोड पर कदम रखेंगे.

इसके लिए साथी पायलट कुरुविला ने एक इलेक्ट्रीशियन का स्क्रू ड्राइवर चुराया. गरेवाल ने कोको कोला की बोतल में छेद करने वाले धारदार औजार का इंतेजाम किया.

रात में दिलीप पारुलकर और गरेवाल दस बजे के बाद प्लास्टर खुरचना शुरू करते तो बाकी साथी निगरानी करते. इस बीच ट्रांजिस्टर के वॉल्यूम को बढ़ा दिया जाता.

14 अगस्त को पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस था. पारुलकर ने अंदाजा लगाया कि उस दिन गार्ड लोग छुट्टी के मूड में होंगे और कम सतर्क होंगे. 12 अगस्त की रात उन्हें बिजली कड़कने की आवाज सुनाई दी. मौसम खराब था लिहाजा यही मौका था जेल से भागने का. तीनों लोग छोटे से छेद से निकले और दीवार के पास इंतजार करने लगे.

नजदीक ही पहरा दे रहे चौकीदार ने धूल से बचने के लिए अपने सिर पर कंबल डाला हुआ था. कैदियों ने बाहरी दीवार से माल रोड की तरफ देखा. उन्हें सड़क पर खासी हलचल दिखाई दी. उसी समय रात का शो समाप्त हुआ था.

तभी आँधी के साथ बारिश भी शुरू हो गई. मौका देख तीनों ने जेल की बाहरी दीवार फांद दी. तेज चलते हुए वो माल रोड पर बांए मुड़े और सिनेमा देख कर लौट रहे लोगों की भीड़ में पाकिस्तान को चकमा देकर जेलों से भागे ये लोग खो गए.

भीगते हुए वो तेज कदमों से चल कर बस स्टेशन पहुंच गए. वहाँ पर एक कंडक्टर चिल्ला रहा था, ‘पेशावर जाना है पेशावर! तीनों लोग कूद कर बस में बैठ गए.

सुबह के छह बजते बजते वो पेशावर पहुंच गए. वहाँ से उन्होंने जमरूद हाते हुए वे लंडी कोतल पहुंच गए. अफगानिस्तान वहाँ से सिर्फ 5 किलोमीटर दूर था.

इस तरह ये  लोग पाकिस्तान को चकमा देकर जेलों से भागे – लेकिन इसी बीच गरेवाल से एक गलती हो गई. उन्होंने वहां एक चाय की दुकान पर शख्स से पूछ लिया कि यहां से लंडीखाना कितनी दूर है. दरअसल, उस वक्त पाकिस्तान में लंडीखाना नाम की जो जबह थी वो अंग्रेजों के जाने के साथ खत्म हो गई थी.

बहरहाल वहां मौजूद तहसीलदार के अर्जीनवीस ने उनकी एक न सुनी और उनको पकड़कर जेल में डाल दिया.

लेकिन जब तक मामला हाईलाइट हो चुका था. यूएन के हस्तक्षेप से बाद में उनको रिहा कर दिया गया.

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