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जितनी मर्ज़ी खाओ, पैसे दे सकते हो तो ठीक और नहीं दे सकते तो भी ठीक!

dhaba

आईएं आज कुछ अलग बात करते हैं, मैं आप को एक कहानी सुनाता हूँ.

ये कहानी एक रेस्टोरेंट की हैं जिसे हिंदी में भोजनालय भी कहते हैं. उसका नाम था ‘ग़रीब होटल’ जिसे अमेरिका से आये एक बाशिंदे मुहम्मद इस्माइल ने खोला था.

इन सब बातों में सबसे दिलचस्प बात ये थी कि यह गरीब होटल पाकिस्तान में खोला गया था.

इस कहानी को बताने के पीछे मेरा मकसद यह हैं कि भारत और पाकिस्तान दुनिया के दो ऐसे मुल्क हैं जहाँ लोग खुद कभी कोई अच्छा काम करने की सोचते नहीं और अगर कोई दूसरा इंसान करना चाहे भी तो करने नहीं देते. इन दो मुल्कों में आप चाहे नेकी करे या बदी, मुसीबत में ही पड़ेंगे.

मेरी याह बात ज़रूर नकारात्मक लग रही हैं लेकिन ऐसा  कहने के पीछे की कहानी बड़ी दिलचस्प हैं.

अमेरिका में रहने वाला एक शख्स का दिल, अपने मुल्क पाकिस्तान की तंग हालत को देखकर पसीज जाता हैं और वह तय करता हैं कि अपने लोगों के पास जाकर उन्हें माली तौर पर न सही लेकिन बुनियादी तौर पर तो मदद की ही जा सकती हैं. अपने इस ख्याल को लेकर मुहम्मद इस्माइल अमेरिका से पाकिस्तान के लिए निकल पड़ता हैं और पाकिस्तान पहुच कर किसी ऐसे शहर को चुनता हैं, जहाँ लोगों पर ग़रीबी इस कदर छाई हैं कि उनके लिए दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम भी बमुश्किल हो पाता हैं.

ऐसे ही किसी शहर की मेन रोड पर इस ख़ुदा के बन्दा एक होटल शुरू करता हैं. अपने होटल के इश्तिहारी बोर्ड पर इस्माइल व्यंजनों के दाम की जगह लिखता हैं “आओ और जितनी मर्ज़ी खाओ, पैसे दे सकते हो तो ठीक और नहीं दे सकते तो भी ठीक

यूँ तो उस रोड पर और भी होटल थे लेकिन इस्माइल के होटल की छत पर लगा यह बोर्ड भुखों के लिए मिठाई की उस दूकान जैसा था, जिसके दरवाज़े पर न तो दरबान खड़ा हैं ना ही कोई सिक्यूरिटी गार्ड और दुकान के अंदर कैशकाउंटर पर   पैसे लेना वाला कोई कैशिअर भी नहीं हैं. बिना किसी रोकटोक के आईएं, जो मर्ज़ी खाईये और पैसे नहीं हैं तो भी कोई इशू नहीं.

इस खुली दावत ने गरीब होटल को तीन महीने में ही हिट कर दिया. लम्बी-लम्बी कतारें, दर्जनों की भीड़ अब ग़रीब होटल के लिए रोज़ का शगल बन गयी थी. पर एक दिन अचानक ग़रीब होटल के बोर्ड पर लिखा था

“ग़रीब होटल बंद हो गया हैं आपका शुक्रिया, मुहम्मद इस्माइल”

इस बोर्ड के बाद इसकी वजह जानना तो बनता ही था. बाजु की पान दूकान से पता करने पर एक और कहानी मालूम हुई. इस्माइल अमेरिका वापस लौट गया, सरफिरा था यार. अच्छा खासा अमेरिका और जॉब छोड़ कर इस मुल्क को बदलने चला आया. कहता था कि मेरे पास पैसे की कोई कमी नहीं हैं, तो सोचा लोगों को सस्ते में खाना खिलाकर ही  दुआएं कमा लूँ.

हम सबने एक कहावत सुनी होगी कि “गाँव बसे नहीं की लुटेरे पहले आ गए इसे लुटने” बस यहाँ भी वहीँ हुआ.

होटल खुला तो इलाक़े के गुंडे भी चौड़े होकर हफ्ता लेने आ गए पर इस्माइल की नेकदिली यहाँ भी काम आ गयी और उन गुंडों ने यही कहा कि ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं करेंगे आपसे लेकिन हमें भी गरीब समझ कर ही कुछ पैसे दे दो.

इन से निपट कर गरीब होटल के सामने एक और मुसीबत खड़ी थी. गली के गुंडे जैसे गए उनकी जगह अब वर्दी वाले गुंडे भी आने लगे. रोज़ डग्गा भर के 25-50 आते, दबा कर खाते और गल्ले में बस 50-100 डाल कर निकल जाते. आसपास के लोगों ने कहा कि इस्माइल भाई इन सब की आदत डाल लो, ये ऐसे साहूकार हैं जिनका क़र्ज़ कभी उतरता ही नहीं.

ग़रीब होटल ये सारे हादसे सह कर भी चुप-चाप रेंग रहा था, पर एक दिन वो हो गया जिसका सभी को मलाल हैं. पुलिस की जगह एक दिन इंटेलिजेंस वाले आ गए और इस्माइल के खाते देखने लगे. इस्माइल को बुलाया गया तो सवाल-सवाल का सिलसिला शुरू हुआ, क्योकि ये लोग सवाल के बाद जवाब तो सुनते ही नहीं हैं.

पहला सवाल किया कि अमेरिका से यहाँ क्या होटल खोलने आये थे?

फिर दूसरा सवाल दागा और ये जो लोगों को सस्ते में खाना खिला रहे हो वो बिसनेस हैं या परोपकार? अगर बिसनेस हैं तब तो तुम घाटे में हो और इतना घाटा सह कैसे रहे हो और अगर दान-धर्म हैं तो इसका लाइसेंस लिए हो?

गोलियों जैसे इन सवाल ने इस्माइल की नेकदिली को छलनी कर दिया था. अब मुहम्मद इस्माइल बस जिन्दा था जो अमेरिका लौट गया.

अब गरीब होटल बंद हो गया और उस मेन रोड में कई होटलों के बाहर उन ग़रीब की भीड़ फिर से खड़ी रहती हैं कि कब होटल से जूठे खाने का ड्रम बाहर आएगा और उन सब को खाना मिलेगा.

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