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मैंने टमाटर काटने के लिए चाक़ू माँगा था! २ साल से जेल में हूँ! – एक आत्मकथा ये भी!

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मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में जर्नलिज्म यानि पत्रकारिता की दूसरे सत्र की एक हिन्दू छात्रा हूँ!

हिन्दू कहना क्यों ज़रूरी है, यह आप मेरा ये लेख पढ़ने के बाद अवश्य जान जाएँगे| मैं अपना नाम आप से साँझा नहीं कर रही हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरे इस लेख को किसी भी प्रकार से प्रचार पाने का कोई ज़रिया समझा जाए|

पिछले दिनों अपने जर्नलिज्म कोर्स के एक प्रोजेक्ट के चलते मुझे मेरे ग्रुप के साथ दिल्ली की प्रसिद्ध तिहाड़ जेल में भेजा गया वहाँ के कर्मचारियों और क़ैदियों से साक्षात्कार करने के लिए| वहाँ मेरी मुलाक़ात एक २२-२३ वर्ष के क़ैदी से हुयी जो अच्छी खासी अंग्रेजी में बात-चीत कर रहा था| पढ़ा लिखा सलीकेदार नौजवान मालूम होता था| उस ने मेरा पूरा ध्यान अपनी तरफ खींच लिया और मुझे उत्सुकता हुयी उस के बारे में और जानने की, और यह भी जानने की, कि उस ने इतनी छोटी उम्र में ऐसा क्या जुर्म किया होगा कि वो जेल में है|

मैंने उस के पास जा कर उस का नाम पूछा तो उस ने बताया की उस का नाम अक़ूब क़ुरेशि है और वो बिहार के इश्माएलपुर गाँव का रहने वाला है! जब मैंने उस से उस की आगे की कहानी जाननी चाहि तो उस ने मेरे हाथ में एक कागज़ थमा दिया और कहा कि दीदी अगर आप सच में मेरी कहानी जानना चाहती हैं तो इसे पढ़िए और मेरी मदद कीजिये!

मैं वो कागज़ वापसी में बस में पढ़ा| और ज्यूँ का त्यूँ आप के सामने रख रही हूँ|

मेरा नाम अक़ूब क़ुरेशि है और मैं बिहार डिस्ट्रिक्ट के इश्माइलपुर गाँव का रहने वाला हूँ| मेरे अब्बा का नाम मक़बूल क़ुरेशि है और अम्मी का नाम हुसैन बीबी| मेरा एक बड़ा भाई है जो शादीशुदा है और अपने परिवार के साथ घर से अलग रहता है| मेरी एक छोटी बहन है जो इश्माईलपुर के सरकारी स्कूल में पढ़ती है! अब्बा गाँव की आटे की चक्की पर काम करते हैं| मैंने सरकारी स्कूल से दसवीं जमात का इम्तिहान दिया और फिर दिल्ली गया ये सोच कर कि यहाँ कर कुछ कामधंधा करूंगा ताकि अब्बा का हाथ बटा सकूँ! दिल्ली कर मैंने आईटीआई से मोबाइल रिपेयर का कोर्स किया और थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी सीखी ताकि महँगे मोबाइल वाले कस्टमर के साथ अंग्रेजी में बात कर सकूँ| मोबाइल की लाइन में आजकल बहुत पैसा हा , ऐसा मेरे ही एक दोस्त ने मुझे बताया था|

कोर्स पूरा होने के बाद, अब्बा के एक दोस्त, जो यहाँ दिल्ली में ऑटो चलाते हैं, उन के कहने पर मुझे एक मोबाइल रिपेयर कि दुकान में नौकरी भी मिल गयी| एक छोटा कमरा भी ले लिया था मैंने रहने के लिए और अब्बा को थोड़े बहुत पैसे घर भेजने लगा| लेकिन इस छोटी दुकान में नौकरी करना मेरा मक़सद नहीं था| इसलिए मैंने सैमसंग जैसी बड़ी कंपनी के मोबाइल सर्विस सेंटर में नौकरी की अर्ज़ी दे दी थी| इस में भी मेरे अब्बा के उन्हीं दोस्त ने मेरी मदद की जो सैमसंग के कुछ कर्मचारियों को जानते थे|

खैर, मैं अपनी अर्ज़ी का जवाब आने का इंतज़ार कर रहा था, जब मेरी पूरी ज़िन्दगी ही बदल गयी| उस रोज़ संडे था और मेरे साथ काम करने वाले दो दोस्त मेरे कमरे पर गए कच्चा मटन ले कर| आते ही बोले चलो अक़ूब मियाँ आज गोश्त पकाओ, सुना है तुम कमाल के कुक हो|

अब दोस्तों की बात कैसे टालता, लेकिन मेरे कमरे पर गोश्त पकाने का पूरा सामान ही नहीं था| सोचा चलो ले आते हैं बाजार से| बाजार हाट से मसाले, प्याज, टमाटर वगैहरा खरीद कर मैं एक बर्तनों कि दुकान पर गया और टमाटर काटने का तेज़ धारदार चाक़ू माँगा| दुकानदार ने मुझे एक छोटा सा चाक़ू दिखाया जो मैंने वापस कर के कहा कि मुझे बड़ा सा तेज़ चाक़ू चाहिए|

मेरे ऐसा कहते ही दुकानदार ने मुझे घूर कर देखा और मेरा नाम पूछा जो मैंने झट से बता दिया| फिर जाने क्यों दुकानदार ने चाक़ू ढूंढने के बहाने मुझे तक़रीबन मिनट खड़ा रखा और दुकान के अंदर जा कर चाक़ू ढूंढता रहा| फिर उस ने अंदर से एक बड़ा सा चाक़ू कर मेरे हाथ में थमा दिया| मैं उस चाक़ू का जायज़ा ले ही रहा था कि मुझे पीछे से किसी ने धर दबोचा और बाहर की तरफ घसीटने लगा! मैं हैरान परेशान हो गया| वो आदमी जो मुझे घसीट रहा था, वो पुलिस की वर्दी पहने था और ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहा था,

चाक़ू चाहिए, अक़ूब नाम है! चल थाने चल, अभी सीधा करता हूँ| तुम लोगों ने अंधेरगर्दी मचा रक्खी है हमारे देश में|”

ये सब कहते हुए वो मुझे थाने ले आया और मुझे पता ही नहीं चला कब मेरे ऊपर चार्ज लगा कर मुझे जेल भेज दिया गया! आज दो साल हो गए हैं मुझे यहाँ|

मेरे अब्बा जेल और कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा कर थक चुके हैं| इतने रुपये भी नहीं हैं कि हम वकील को खिला पिला कर या जज को खिला कर मामला रफा दफा करवा दें| मुझे समझ नहीं आता कि मेरा क़ुसूर क्या था? मैं तो सिर्फ दोस्तों के साथ संडे मना रहा था| मेरा नाम अक़ूब क़ुरेशि है, क्या ये मेरा जुर्म है? क्या अपने ही देश में मुझे हक़ नहीं है एक अच्छे मुस्तक़बिल का?

बस यही है मेरी कहानी| अगर आप मेरी कोई मदद कर सकते हैं तो प्लीज कीजिये और मुझे यहाँ से बाहर निकालिये| यहाँ से निकल कर मुझे सैमसंग में नौकरी मिलेगी या नहीं मैं नहीं जानता, लेकिन मैं जीना ज़रूर चाहता हूँ| ” – अक़ूब क़ुरेशि, इश्माईलपुर, जिला बिहार, अभी तिहाड़ जेल में|

तो ये था जो मैंने उस कागज़ पर पढ़ा| अब आप समझ गए होंगे कि मैंने आप को यह बताना ज़रूरी क्यों समझा कि मैं एक हिन्दू हूँ| लेकिन एक हिन्दुस्तानी सब से पहले हूँ|

क्या आप के मन में भी कोई सवाल उठ रहे हैं जो मेरे मन में पिछले कई दिनों से उठे रहे हैं?

मुझे ज़रूर बताईयेगा!

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