शिक्षा और कैरियर

इस स्कूल में सिर्फ एक ही बच्चा है फिर भी 130 किलो मीटर की दूरी तय कर आता है ये टीचर आखिर क्यों ?

रजनीकांत मेंढे – इस दुनिया में जन्म लेने के बाद अगर आपको कोई इंसान बनाता है तो वो है टीचर.

ये शिक्षक ही आपको दुनिया के साथ खड़ा होना सिखाता है. बचपन से लेकर जब तक आप पढ़ाई करते हैं तब तक ये टीचर आपका दिशा निर्देश करता है. आजकल के ज़माने में अच्छे टीचर की कमी हो गई है. ऐसा लोग कहते हैं, लेकिन आज हम आपको एक ऐसा उदाहरण देंगे, जो आपकी सोच ही बदल देगा.

इस दुनिया में इस धरती पर आज भी कई ऐसे टीचर हैं, जो बिना मुनाफा या अपना हित सोचे आज भी शिक्षा प्रदान करते हैं. वो आज भी अपने इस काम को बड़ी ईमानदारी और परिश्रम से करते हैं. इसका ताज़ा उदाहरण हैं महारष्ट्र के रजनीकांत मेंढे.

जी हाँ, टीचर की नौकरी को आराम का जरिया समझने वाले शिक्षकों के लिए महाराष्ट्र में एक शख्स प्रेरणा बन गया. ये शख्स भी एक टीचर है. इनका नाम है रजनीकांत मेंढे. जितनी दिक्कत उठाकर ये एक गाँव में पढ़ाने जाते हैं उतनी दिक्कत खुद कोई माँ-बाप भी नहीं लेता. 

पेशा ही ऐसा है कि ईमानदारी की कसम तो राग राग में है.

पेशे की खातिर महज़ एक बच्चे को पढ़ाने के लिए रजनीकांत अपनी मोटर साइकिल से रोजाना 130 किलो मीटर का सफ़र तय कर पढ़ाने आते हैं. सफर के दौरान रजनीकांत को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. बावजूद इसके रजनीकांत ने हार नहीं मानी और पिछले साल से उनका सफर लगातार जारी है. एक खबर के मुताबिक़ रजनीकांत मेंढे नागपुर के रहने वाले हैं और पेशे से एक सरकारी शिक्षक हैं. साल 2010 में उनकी पोस्टिंग पुणे से करीब 65 किलोमीटर दूर भोर के चंदर गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई थी.

इस गांव तक पहुंचने के लिए ऊंची पहाड़ी और धूल मिट्टी से भरे रास्तों से गुजरना पड़ता है. इस सफर को तय करने के लिए रजनीकांत मेंढे बाइक का सहारा लेते हैं. हर दिन किसी न किसी तरह से रजनीकांत मेंढे वहां गाँव के स्कूल में पहुंचते हैं. 

गाँव बेहद पिछड़ा और गरीब है.

पढ़ाई के नाम पर लोगों में कोई जागरूकता नहीं है. यहाँ सर्कार की भी कोई योजना नहीं पहुँच पाती.  रजनीकांत ने बताया कि पिछले दो साल से स्कूल में सिर्फ आठ साल का युवराज पढ़ने आता है. रजनीकांत बताते हैं कि गांव में और भी बच्चे हैं लेकिन वे पढ़ने नहीं आते. युवराज को भी उन्हें कभीकभी ढूंढ कर लाना पड़ता हैवो कभी पेड़ तो कभी अपने घर में ही छुप जाता हैरजनीकांत कहते हैं कि अकेले स्कूल आना और वहां पढ़ना किसी भी बच्चे के लिए बोझ सा है.

लेकिन वे अपने स्टूडेंट को पढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध हैं. भला आज के ज़माने में इस तरह का टीचर किसी को मिलेगा.

शहरी इलाकों में एसी और मोटी रकम वसूलने वाले टीचर भी इतनी तल्लीनता से नहीं पढ़ाते.

शहरी स्कूलों में अब जाना इसलिए मुश्किल हो गया है की वहां पर बच्चों के साथ बुरी वारदात होने लगी है. अजीब समय आ गया है. जहाँ सारी सुविधायें हैं वहां भी बच्चे नहीं और जहाँ नहीं हैं वहां भी नहीं.  दोनों ही स्थिति भारत के लिए ठीक नहीं है.

रजनीकांत मेंढे – अब तो सरकार को कुछ ऐसा करना होगा, जिससे शहरी स्कूलों की ही तरह हमारे गाँव के स्कूल भी हो सकें. सिर्फ कागज़ पर प्लान बनाने से काम नहीं चलेगा.

Shweta Singh

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