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आरएसएस के संस्थापक महिलाओं के लिए ये सोचते है जो हर महिला को जानना चाहिए

आरएसएस की विचारधारा

आरएसएस की विचारधारा – बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में महिलाओं के प्रदर्शन और उसपर अपने रुख को लेकर भाजपा की केंद्र सरकार घिर गई। इस मुद्दे को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ था कि दूसरी बार भाजपा की वैचारिक नींव माने जाने वाले आरएसएस पर राहुल गांधी ने गहरे सवाल खड़े कर दिया है।

दरअसल, जो सवाल राहुल गांधी ने अभी उठाए उसकी नींव तो बीएचयू में महिलाओं के साथ हुई घटना के वक्त ही पड़ गई। जिस तरह से छात्राओं के आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार ने महिला प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज करवाया वह सरकार का महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है। इस घटना ने साफ कर दिया कि सरकार महिलाओं के हक की बात तो करती है, लेकिन जमीनी हकीकत और कुछ और ही है।

ऐसे में राहुल के आरोपों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

देश की बागडोर संभालने वाली राजनीतिक पार्टी आरएसएस की विचारधारा को फ्लो करती है ऐसे में देश की हर महिला को यह जरुर जानना चाहिए की आरएसएस की विचारधारा महिलाओं के बारें में क्या है।

आरएसएस की स्थापना डॉ केशवराव बलिरामराव हेडगेवार ने 1936 में की। आरएसएस की स्थापना के बाद ही एक महिला लक्ष्मीबाई केलकर भी संघ में शामिल होकर देश और समाज की सेवा करना चाहती थी लेकिन संघ के संस्थापक हेडगेवार के विचार महिलाओं को लेकर बहुत अलग थे जिस कारण केलकर संघ में काम नहीं कर पाई।

डॉ हेडगेवार ने केलकर को यह कहते हुए साफ मना कर दिया कि संघ में स्त्रियां नहीं आती। उनके इस विचार से केलकर बहुत परेशान हुई और उन्होंने खुद एक महिलाओं का संगठन बनाने की कसम खा ली।

इसके बाद ही महाराष्ट्र की लक्ष्मीबाई ने ‘राष्ट्र सेविका समिति’ स्थापित की। आज यह संठगन इतना विशाल हो चुका है कि विश्व के 25 देशों में यह काम कर रहा है।

ज्यादातर लोग इसे संघ की महिला इकाई समझते हैं लेकिन यह समिति राष्ट्र और समाज के विषय पर तो आरएसएस की विचारधारा पर ही चलती है लेकिन महिलाओं को लेकर संघ के विचार से बिल्कुल अलग है।

संघ के संस्थापक के विचार अगर महिलाओं के उत्थान के लिए होते तो आज यह अलग संगठन नहीं होता बल्कि संघ का ही एक हिस्सा होता।

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