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क्या आरएसएस और मुस्लिम बद्ररहुड एक समान है ?

आरएसएस और मुस्लिम बद्ररहुड

आरएसएस और मुस्लिम बद्ररहुड – हर धर्म, हर सोच एक दूसरे से अलग होती है जिस वजह से कभी – कभी किन्ही दो चीजों की तुलना करने से पहले इस बात पर जरुर गौर करना चाहिए कि क्या ये तुलना सही है? क्योंकि दो देशों की धर्म, संस्कृति से जुड़ी परिस्थितियां अलग – अलग हो सकती है ।

हालांकि इस बात को बहुत से लोग नहीं समझ पाते है अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के उस बयान पर ही नजर डाल लीजिए जिसमें उन्होनें आरएसएस की तुलना मिस्त्र के मुस्लिम ब्रदरहुड से कर दी । आरएसएस और मुस्लिम बद्ररहुड को एक ही कहा है –

बिना ये समझे की क्या आरएसएस और मुस्लिम बद्ररहुड के बीच तुलना करना सही है ?

आरएसएस और मुस्लिम बद्ररहुड

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने लंदन के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रैटेजिक स्टडीज में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की तुलना मिस्र् में जन्मे मुस्लिम ब्रदरहुड से की । ये बात थोड़े दिन पहले की है लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की ये बात कुछ ऐसी थी कि इसे नजरअंदाज करने के बावजूद भी सोचने पर मजबूर कर ही देती है । राहुल गाँधी ने भाषण देते हुए कहा कि हमारा सामना एक नए विचार से है जिसका पुर्नजन्म हुआ है और यह वैसा ही है जैसा अरब वर्ल्ड में मुस्लिम ब्रदरहुड है ।

हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष की तुलना को सही कहने से पहले ये जानना जरुरी है कि आखिर मुस्लिम ब्रदरहुड है कौन जिसे राहुल गांधी ने आरएसएस की तुलना की ।

दरअसल मुस्लिम बद्ररहुड की उत्पति साल 1928 में मिस्त्र में हुई थी । मुस्लिम ब्रदरहुड कुरान को शरिया का एक मात्र स्रोत मानता है और इसी के आधार पर मुस्लिम ब्रदरहुड वैश्विक स्तर पर इस्लामिक समाज और साम्राज्य कायम करना चाहता है ताकि सभी इस्लामी क्षेत्र एकजुट हो सकें । लेकिन अफसोस जनक बात ये है कि मुस्लिम बद्ररहुड ने अपने इस सपने के लिए हमेशा कुरीतियों, संप्रदायिकता को बढ़ावा दिया है । माना जाता है कि मुस्लिम ब्रदरहुड की नजर में मर्द और औरत अलग- अलग है जिस वजह से वो औरतों के हक की बात नहीं करते है इसके अलावा नाच गाना उनकी नजर में पाबंदी लायक है । मुस्लिम ब्रदरहुड अरब देशों में अपने मनसूबों को पूरा करने के लिए निहत्थे कमजोर लोगों पर हिंसा करने से भी नहीं चुकते है । रिपोर्टस के अनुसार इस संघ के नेता कई बार तख्तापलट की कोशिशें भी कर चुके है साथ ही शासन अधिकारियों की हत्या की कोशिशों में भी इनका नाम आ चुका है ।

वही दूसरी तरफ आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ भारत का ऐसा संघ जिसकी स्थापना आजादी से पहले ही हो गई थी ।

आरएसएस हिंदुत्व की सोच पर आगे बढ़ता है लेकिन हिंदुत्व की उत्पत्ति तो करोड़ो साल पुरानी है फिर इसे पुर्नजन्म और नई सोच कैसे कहा जा सकता है  आरएसएस को लेकर कहा जाता है कि वो भारत को हिंदु राष्ट्र के तोर पर देखती है लेकिन ये भी सत्य है कि भारत हिंदुस्तान नाम आरएसएस ने नहीं दिया ये आरएसएस की स्थापना के पहले ही दिया जा चुका था ।

लेकिन आरएसएस भले ही हिंदु धर्म की बात करता हो लेकिन बाढ़ आपदा जैसे स्थानों पर मदद करने के लिए भी आरएसएस के कार्यकर्ता आगे आए है जिसे झुकलाय़ा नहीं जा सकता । साथ ही आरएसएस ने कभी स्त्री को पुरुषों रहने की बात नहीं कही ना ही सत्ता के लिए तख्तापलट की कोशिश की । अगर इन सब बातों को तोलमोला जाए तो ये बात सोचने पर जरुर मजबूर करती है कि आखिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुस्लिम बद्ररहुड और आरएसएस को एक समान क्यों कहा ?

आरएसएस और मुस्लिम बद्ररहुड – क्या आपसी मतभेदो को विदेशी धरती पर उजागर करना सही है? अगर हम किसी संघ की सोच के मत में नहीं है तो इसका अर्थ ये तो नहीं है कि हम दो अलग – अलग सोच रखने वाली सोच को एक समान कहें ?

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