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पावागढ़ – पहले यहाँ महाकाली के दर्शन कीजिए और फिर सैर-सपाटे का मज़ा लीजिए !

पावागढ़

अक्सर लोग अपनी छुट्टियों को एंन्जॉय करने के लिए किसी खास पर्यटन स्थल की तलाश करते हैं.

अगर लोगों को सैर-सपाटे के साथ ही देवी मां के दर्शन का सौभाग्य भी मिल जाए तो फिर क्या बात है. ऐसे पर्यटन स्थल पर जाकर तो आपकी छुट्टियों का मज़ा डबल हो जाएगा.

हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसे ही पर्यटन स्थल के बारे में जो सैर-सपाटे के साथ ही आस्था का एक बड़ा केंद्र माना जाता है.

तो आइए जानते पावागढ़ से जुड़ी कहानी और उससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में.

पावागढ़ से जुड़ी कहानी

वड़ोदरा से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पावागढ़ के नाम के पीछे एक कहानी बताई जाती है.

कहते हैं कि एक जमाने में दुर्गम पर्वत पर चढ़ाई लगभग नामुमकीन थी. चारों तरफ खाइयों से घिरे होने की वजह से यहां हवा का वेग भी हर तरफ एक-सा रहता है. इसलिए इसे पावागढ़ कहा जाता है इसका मतलब है एक ऐसी जगह जहां पवन का वास हो.

पावागढ़ पहाड़ी की शुरुआत चंपानेर से होती है. इसकी तलहटी में चंपानेरी नगरी है, जिसे महाराज वनराज चावड़ा ने अपने बुद्धिमान मंत्री के नाम पर बसाया था.

करीब 1471 फुट की ऊंचाई पर माची हवेली स्थित है. यहां स्थित मंदिर तक जाने के लिए माची हवेली से रोप वे की सुविधा उपलब्ध है. यहां से पैदल मंदिर तक पहुंचने लिए लगभग 250 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं.

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महाकाली मंदिर से जुड़ी मान्यताएं

पावागढ़ में स्थित प्राचीन महाकाली का मंदिर माता के शक्तिपीठों में से एक है. शक्तिपीठ उन पूजा स्थलों को कहा जाता है, जहां सती के अंग गिरे थे.

पुराणों के अनुसार, पिता दक्ष के यज्ञ के दौरान अपमानित हुई सती ने योग बल से अपने प्राण त्याग दिए थे. सती की मृत्यु से व्यथित भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में भटकते रहे. माता के अंग जहां-जहां गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गये.

कहा जाता है कि सती के दाहिने पैर का अंगूठा यहीं गिरा था, जिसके कारण इस जगह का नाम पावागढ़ हुआ. इसीलिए यह स्थल बेहद पूजनीय और पवित्र मानी जाती है.

यहां की खास बात यह है कि यहां दक्षिणमुखी काली मां की मूर्ति है, जिसकी तांत्रिक पूजा की जाती है. इस पहाड़ी को गुरु विश्वामित्र से भी जोड़ा जाता है. कहते हैं कि गुरु विश्वामित्र ने यहां मां काली की तपस्या की थी.

पावागढ़ का महाकाली मंदिर, उन्हीं शक्तिपीठों में से एक है. इतिहास के पन्नों में पावागढ़ का नाम महान संगीतज्ञ तानसेन के समकालीन संगीतकार बैजू बावरा के संदर्भ में आया है.

बताया जाता है कि यह मंदिर अयोध्या के राजा भगवान श्री रामचंद्रजी के समय का है. इस मंदिर को एक जमाने में शत्रुंजय मंदिर कहा जाता था. माघ महीने के शुक्ल पक्ष में यहां मेला लगता है.

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सांप्रदायिक सौहार्द्र का प्रतीक

देवी मां के शक्तिपीठों में से एक महाकाली के इस दरबार में सांप्रदायिक सौहार्द्र की एक अनोखी मिसाल देखने को मिलती है.

एक ओर जहां महाकाली मंदिर हिंदुओं की आस्था का केंद्र है तो वहीं इस मंदिर की छत पर मुस्लिमों का पवित्र स्थल है जहां अदानशाह पीर की दरगाह है. यहां बड़ी संख्या में हिंदुओं के साथ ही मुस्लिम श्रद्धालु भी दर्शन करने के लिए आते हैं.

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पर्यटकों को लुभाता है पावागढ़

गुजरात के पंचमहल जिले में स्थित पावागढ़ महाकाली का मंदिर पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक तथा पर्यटन की दृष्टि से प्रदेश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है.

यहां ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस शक्तिपीठ और उसके आसपास का नज़ारा काफी अद्भुत है. यही वजह है कि ये स्थल यहां आनेवाले पर्यटकों को खासा लुभाता है.

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कैसे पहुंचे पावागढ़ ?

वायुमार्ग

अगर आप यहां हवाई यात्रा करके आना चाहते हैं तो यहां से सबसे नजदीक अहमदाबाद का एयरपोर्ट है, जिसकी दूरी यहां से करीब 190 किलोमीटर और वडोदरा से 50 किलोमीटर है.

रेलमार्ग

पावागढ़ पहुंचने के लिए यहां का नजदीकी बड़ा रेलवे स्टेशन वडोदरा है, जो कि दिल्ली और अहमदाबाद से सीधी रेल लाइनों से जुड़ा हुआ है. वडोदरा पहुंचने के बाद सड़क यातायात के सुलभ साधन उपलब्ध हैं.

सड़क मार्ग

प्रदेश सरकार और निजी कंपनियों की कई लक्जरी बसें और टैक्सी सेवा गुजरात के अनेक शहरों से यहां के लिए संचालित की जाती है.

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गौरतलब है कि नवरात्र के वक्त पावागढ़ में सैलानियों की खासी भीड़ उमड़ती है.

यहां आनेवाले लोग सबसे पहले महाकाली के मंदिर में दर्शन करते हैं फिर इस जगह पर घूमने का भरपूर आनंद उठाते हैं.

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