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एक ऐसा मंदिर जहाँ पूजा नहीं बल्कि लकवे का इलाज कराने जाते हैं लोग !

पैरालायसिस का इलाज

पैरालायसिस का इलाज – हम सब लोग मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए ही जाते हैं।

हम मंदिर में जाकर भगवान से प्रार्थना करते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए भगवान से विनती करते हैं। लेकिन क्या मंदिर सिर्फ देवी-देवताओं के दर्शन करने के लिए ही जाते हैं। जी नहीं, आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे जहां लोग भगवान के दर्शन के लिए नहीं बल्कि इलाज करवाने जाते हैं। जी हां, ये बिल्कुल सच है।

राजस्थान में एक मंदिर ऐसा है जहां लोग पैरालायसिस का इलाज कराने जाते हैं। आइए आपको विस्तार से बताते हैं इस मंदिर के बारे में।

पैरालायसिस का इलाज

राजस्थान के नागौर जिले में है मंदिर:

राजस्थान के नागौर जिले के कुचेरा कस्बे के पास संत चतुरदास जी महाराज के नाम से मशहूर इस मंदिर में लोग पैरालायसिस का इलाज कराने आते हैं। कहा जाता है कि लगभग 500 साल पहले संत चतुरदास जी इस गांव में आए थे। वो बहुत ही सिद्ध संत थे और वो अपनी तपस्या से लोगों के रोगों का इलाज करते थे। लोगों का मानना है कि जब उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया तो उनकी समाधि बना दी गई। उनकी समाधि के सात फेरे लगाने से आज भी लोग पैरालायसिस के रोग से मुक्त हो जाते हैं। इस मंदिर में पैरालायसिस का इलाज कराने दूर-दूर से लाखों लोग आते हैं और रोग मुक्त होकर जाते हैं।

सिर्फ 7 फेरे लगाने से हो जाते हैं रोगमुक्त:

इस मंदिर में मरीजों के इलाज के लिए कोई डॉक्टर नहीं होता, ना ही उन्हें दवा देने के लिए कोई नर्स होती है। बल्कि समाधि के सिर्फ परिक्रमा लगाने से ही मरीज रोगमुक्त हो जाता है। कहा जाता है कि मरीज अगर इस समाधि के 7 फेरे लगाए तो उसे रोग से छुटकारा मिल जाता है। 7 फेरे लगाने से शरीर के जो अंग काम नहीं कर रहे होते वो धीरे-धीरे हरकत करने लगते हैं और थोड़ी देर के बाद वो पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं।

यहाँ इस तरह से पैरालायसिस का इलाज होता है –  हालांकि विशेषज्ञों से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कुछ भी कहने से मना कर दिया।

लेकिन कई लोग इसे अंधविश्वास भी करार देते हैं। लेकिन अगर मरीजों को इससे फायदा हो रहा है तो इसे अंधविश्वास बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता। ये भी दावा किया जाता है कि कई मरीजों का इलाज बड़े-बड़े डॉक्टर भी नहीं कर सके थे लेकिन जब वो इस मंदिर में आए तो वो यहां से ठीक होकर गए। भले ही आज हम 21वीं सदी में जी रहे हों लेकिन आज भी आस्था का विषय एक ऐसा विषय है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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