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इस इंजीनियर के बिना नहीं हो सकता था भारत का निर्माण !

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया – भारत के बड़े ही खास इंजीनियर के जन्मदिन को इंजीनियर दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारत के इस प्रख्यात इंजीनियर को सन् 1955 में भारत रत्न द्वारा सम्‍मानित किया गया था।

इनका भारतवर्ष के निर्माण में बड़ा योगदान रहा है। यहां तक कि ये भी कहा जा सकता कि अगर यह नहीं होते तो भारत शायद ही इस आधुनिक रूप में उभर कर आ पाता।

तो चलिए आपको बताते हैं कि आखिर कौन है यह व्यक्ति जिसका भारत के निर्माण में इतना महत्वपूर्ण योगदान रहा है –

दोस्‍तों, यह कोई और नहीं बल्कि भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (एम. विश्वेश्वरैया) हैं जोकि ना केवल एक उत्‍कृष्‍ट इंजीनियर थे बल्कि यह एक राजनेता भी थे।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया

यह सन् 1860 में 15 सितम्बर को कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर के ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। उनके पिता श्रीनिवास शास्त्री संस्कृत के विद्वान और आयुर्वेदिक चिकित्सक थे लेकिन जब मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया मात्र 12 साल की उम्र के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया था और उनके सिर से पिता का साया छिन गया था।

साल 1883 में एलसीई व एफसीई की परीक्षा में अव्‍वल आकर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने अपनी योग्यता का पहला प्रमाण पेश किया था। इसे देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के तौर पर नियुक्त किया था।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया द्वारा भारत में किए गए उनके अतुल्‍य योगदान –

– डेक्कन में एक जटिल सिंचाई व्यवस्था को कार्यान्वित किया।

– संसाधनों और उच्च तकनीक के अभाव में भी उन्होंने कई परियोजनाओं को सफल बनाया।

– कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय और बैंक ऑफ मैसूर जैसे कई अनोखे निर्माणों को भारत में लाए।

उनके इस योगदान को देखते हुए मैसूर के महाराजा ने सन् 1912 में उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री नियुकत कर दिया था। इसके बाद 1919 तक मैसूर के दीवान के रूप में उन्होंने कई विकास के लिए अथक प्रयास किए थे।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के इन निर्माणों के बिना भारतवर्ष आज इतना विकसित नहीं हो पाता।

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