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असहिष्णुता से जिनको डर लगता था वे आज मोहम्मद शमी की पत्नी पर क्यों खामोश है !

मोहम्मद शमी

ऐसा लग रहा है कि जैसे देश से असहिष्णुता का नामोनिशान मिट गया है.

इसलिए नहीं कि आमिर खान की दंगल करोड़ों की कमाई कर रही है और उनकी फिल्म का कोई विरोध नहीं कर रहा है.

बल्कि इसलिए कि भारत के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी और उनकी की पत्नी हसीन जहान पर एक के बाद एक धार्मिक कट्टरपंथी हमले कर रहे हैं और देश के वे तमाम सेक्युलर बुद्धिजीवी जिन्हें आमिर खान पर टिप्पणी में देश में असहिष्णुता नजर आती थी, आज खामोश बैठे हैं.

आमिर खान पर हमला हिंदू कट्टरता की परिभाषा के दायरे मे आ जाता है जबकि मोहम्मद शमी की पत्नी पर भद्दे और ओछे कमेंट मुस्लिम कट्टरता की परिभाषा नहीं पाता है, क्योंकि सेक्युलर बुद्धिजीवी किस मुद्दे पर मुखर होते हैं और किस पर खामोश रहेंगे आज इसी से ही देश में कट्टरता और सहिष्णुता की परिभाषा तय हो रही है.

आज ये देश के सेक्युलर बुद्धिजीवियों की असली पहचान और चरित्र बन चुका है.

जब भी मुस्लिम कठमुल्ला अपने समुदाय या किसी अन्य समुदाय के व्यक्ति को निशाना बनाते हैं तो देश में ये तमाम सेक्युलर बुद्धिजीवी शुतुमुर्ग की भांति रेत में सर छुपा लेते हैं.

मुस्लिम कट्टरता के खिलाफ देश के ये सेक्युलर बुद्धिजीवी कभी अवाज नहीं उठाते हैं. ये लोग टीवी चैनलों पर बैठकर ये ज्ञान देते थे कि अब देश में बहुसंख्यक तय करेगी कौन क्या खाएगा और क्या पहनेगा. लेकिन मोहम्मद शमी के मामले में ये लोग चुप है. और तो और धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाला मीडिया भी इसको लेकर बहस कराने से डर रहा है.

गौरतलब है कि टीम इंडिया के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी ने हाल ही में अपनी पत्नी हसीन जहान के साथ एक फोटो सोशल मीडिया साइट पर डाली है. जिसको लेकर धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों ने शमी और उनकी पत्नी को खरी खोटी सुनाने के साथ अमर्यादित टिप्पणी करनी शुरू कर दी.

धार्मिक कट्टरपंथी शमी और उनकी पत्नी को इस्लाम को लेकर लेक्चर पिला रहे हैं और सोशल मीडिया पर बयानों का बवाल काट रहे हैं लेकिन उसके बचाव में सेक्युलर जमात बोलने तक से कतरा रही है.

सोचिए अगर मोहम्मद शमी पर किसी हिंदू संगठन की ओर से कोई टिप्पणी की जाती तो ये बुद्धिजीवियों की सेक्युलर जमात आसमान सर पर उठा लेती.

लेकिन यहां पर टिप्पणी करने वाले मुस्लिम है और वे मामले को इस्लाम से जोड़ रहे हैं तो इन लोगों को भी बोलने में डर लग रहा है. इजराइल से लेकर बर्मा और अमेरिका तक बोलने वाले इन सेक्युलर बुद्धिजीवियों की बुद्धि मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने मात खा जाती है.

यही कारण है कि देश में आज बोलने को लेकर भी हिंदू मुस्लिम की लाइन गहराती जा रही है.

यदि समाज के गलत कार्यों को गलत कहने में भी बुद्धिजीवी जमात को हिंदू मुस्लिम के नजरिए से देखने और बोलने की आदत पड़ जाए तो समझ लेना चाहिए कि ये लोग हमारी आंखों में धूल नहीं मिर्च झौंक रहे हैं.

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