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क्या है शहादत बस चार दिन का मौन ?

ऐ मेरे वतन के लोगों

तुम खूब लगा लो नारा

ये शुभ दिन है हम सब का

लहरा लो तिरंगा प्यारा

पर मत भूलो सीमा पर

वीरों ने है प्राण गँवाए

कुछ याद उन्हें भी कर लो

जो लौट के घर न आये

देश की पहली महिला लेफ्टिनेंट किरण शेखावत देश की सेवा करते हुए शहीद हो गईं हैं. यहाँ हम आपको इनकी शहादत के सहारे ही एक और कड़वा सच बताना चाहते है, हम बात करना चाहते हैं उन हज़ारों शहीदों की जो इस तरह के हादसों में अक्सर शहीद हो जाते हैं.

हम क्या कभी समझ पायेंगे कि देश के लिए अपनी जान देने वाले वीरों को आखिर मिलता क्या है? हँसते-हँसते ये लोग अपनी जान दे देते हैं. अपने परिवार से पूरे साल अलग रहते हैं.

समझ नहीं आता कि किस माटी के बने हैं ये देश भक्त जवान. फिर भी आये दिन हो रही दुर्घटनाओं में इनकी जानें क्यों जा रही हैं, यह सवाल ना जाने कितने सालों से उठ रहा है, पर आज तक इसका हल नहीं मिल पाया है.

आइये आपको बता देते हैं कि हम आज यह बातें क्यों कर रहे हैं-

राजस्थान की बेटी और मेवात जिले के कुरथला गांव की बहू और नौसेना की पर्यवेक्षक लेफ्टिनेंट किरण शेखावत देश की सेवा करते हुए शहीद हो गईं हैं. गोवा में हुए दुर्घटनाग्रस्त हेलिकॉप्टर के मलबे से लेफ्टिनेंट शेखावत का पार्थिव शरीर मिला चुका है.

किरण शेखावत को कब तक याद करेगा भारत? मात्र 2 से 4 दिन. सभी लिख रहे हैं कि देश की पहली महिला लेफ्टिनेंट शहीद?

आप लोग उस घर के दर्द को नहीं समझ सकते हैं, जिस घर से किरण जी ताल्लुक रखती थी. क्या आप किरण जी के पति लेफ्टिनेंट विवेक चोकर का दर्द समझ सकते हैं? किरण और विवेक की शादी दो साल पहले हुई थी, लेकिन उन्हें कभी भी साथ रहने का मौका नहीं मिला.

दुर्घटनाग्रस्त हेलिकॉप्टर की पूरी जांच क्या नहीं होनी चाहिए? क्या एक देश भक्त सैनिक की जान इतनी कम है कि बस हम 2 से 4 दिनों के अन्दर ही उसको भुला दें.

विवेक ( किरण जी के पति) के मुताबिक, मंगलवार शाम 6.30 बजे उनकी किरण से बात हुई थी, लेकिन इसके बाद आधी रात तक वह किरण के फोन का इंतजार करते रहे. विवेक ने कहा इसके बाद मुझे किरण के बारे में सूचना मिली और मुझे गोवा पहुंचने को कहा गया. इनको उम्मीद थी कि नेवी किरण की जान बचा लेगी, लेकिन तीन दिन बाद किरण का शव बरामद हो गया और उम्मीद टूट गई.

एक बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारे फौजियों की जान ऐसे ही हादसों में जाती रहेगी क्या? जांच में कोई भी रिपोर्ट सत्य के नजदीक नहीं पहुंचती दिखती है. आपको याद हो कि फिल्म ‘रंग दे बसंती’ में भी कुछ ऐसा ही मुद्दा उठाया गया था.

पर आये दिन इसी तरह के हादसे होते ही रहते हैं, हम समझते हैं कि हादसों को रोका नहीं जा सकता है पर इन हादसों को कम तो किया जा सकता है. हम जो दूसरे देशों से हथियार या अन्य सामग्री खरीदते हैं कई बार तो वह ही घटिया स्तर की होती हैं.

अब वक़्त आ गया है कि अपने जवानों की जान की किम्मत हमें समझनी होगी या एक कानून बनाना होगा कि चाहे कोई अमीर हो या गरीब सभी को अपना एक बच्चा देश की फ़ौज के नाम करना होगा ताकि हर फौजी की जान हमारे लिए माइने रखे.

हमें बहुत अच्छी तरह पता है आने वाले समय में ऐसे और जवान भी शहीद होने वाले हैं और हर शहादत को हम बस 2 से 4 दिनों में भुलाने वाले हैं.

इन हादसों की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा, सरकार हमारी? हमारी आर्मी? या बस भगवान भरोसे सब चलता रहेगा?

आपकी राय का इंतज़ार रहेगा…

Chandra Kant S

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Chandra Kant S

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