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मकर संक्रांति – मकर संक्रांति देवताओं का प्रभात काल है !

मकर संक्रांति
दिनांक 14 जनवरी 2017  शनिवार से दाेपहर 1 बजकर 55 मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर जाएगा एवं खरमास की समाप्ति भी हो जाएगी।
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है।
इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। सूर्य कर्क राशि में आने तक उत्तरायण रहेगा यह देवताओं को एक दिन एवं कर्क से धनु तक देवताओं की रात होती है।
मकर संक्रांति देवताओं का प्रभात काल है इस दिन स्नान, जाप, दान, श्राद्ध, पूजनादि का विशेष महत्व है। इस दिन घृत, कंबल, पादुकाएं आदि का दान दिया जाता है। यह दान संपूर्ण भोग एवं मोक्ष को देने वाला होता है।
मकर संक्रांति पर्व को देश के विभिन्न हिस्सों में अलग नामों एवं तरीके से मनाया जाता है. उत्तर प्रदेश में इसको खिचडी कहते है एवं तिल के साथ खिचडी का दान दिया जाता है।
महाराष्ट्र में विवाहित स्त्रियाँ पहली मकर संक्रांति पर तेल, कपास, नमकादि वस्तुएं सौभाग्यवती स्त्रीयों को दान करती है। बंगाल में भी स्नान कर तिल का दान दिया जाता है एवं दक्षिण में इसे पोंगल के रूप में मनाया जाता है। असम में इस दिन बिहू का पर्व मनया जाता है। राजस्थान में सौभाग्यवती स्त्रीयां अपनी सास को तिल, तिल के लड्डु, घेवर, आदि का दान करती है। पंजाब एवं जम्मू कश्मिर में इसको लोहिड़ी के नाम से मनाया जाता है।
कथा के अनुसार इस दिन गोकुल में भगवान कृष्ण ने खेल ही खेल में लोहिता नामक राक्षसी का अंत किया था। इसलिए भी लोहिडी पर्व मनाया जाता है। गुजरात एवं महाराष्ट्र में कई खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन इस दिन होता है।
इस दिन से शीत का प्रकोप कम होने लगता है एवं धिरे-धिरे दिन बडे होने लगते है।
तिल के दान का इस दिन बडा महत्व बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन से सूर्य की गति तिल-तिल बढती है। सूर्य उर्जा का स्रोत है। इस दिन से दिन बडे होने लगते है एवं सूर्य की रश्मियाें का ज्यादा प्रभाव पृथ्वी को मिलने लगता है।
इससे प्राणी जगत की चेतना एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होती जाती है। इसलिए भी इस मकर संक्रांति पर्व को मनाने का विशेष महत्व है।

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