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नंदी कैसे बने शिव की सवारी जानिये ये दिलचस्प कहानी

नंदी बैल

नंदी बैल – भगवान शिव हिन्दू धर्म में विशेष महत्व रखते हैं. ये इकलौते ऐसे भगवान हैं, जिन्हें देवता, दैत्य और इंसान पूजते हैं.

भगवान शिव ने कभी भी अपने भक्तों में भेद नहीं किया. भले ही वो दानव ही क्यों न हों, इसीलिए भगवान शिव की भक्ति पूरे लोक में फ़ैल गई. भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता बन गए, जिन्हें हर कोई पूजता है.

भगवान शिव की आराधना और पूजा तो हर कोई करता है. उनेक मंदिर में जाने से पहले आपने नंदी बैल को देखा होगा. नंदी बैल की पूजा करने के बाद ही लोग मंदिर में प्रवेश करते हैं. असल में बिना इनको चढ़ावा चढ़ाए आपकी भक्ति पूरी नहीं होती.

नंदी बैल को भगवान शिव का प्रिय माना गया है. भगवान शिव के प्रिय गणों में नंदी महत्व रखते हैं.

नंदी को भगवान शिव ने अपनी सवारी के रूप में भू चुना. ये विशेष महत्व किसी और को नहीं प्राप्त है.

किसी भी मंदिर में शिव से पहले इनकी आराधना की जाती है. इन्हें माला-फूल आदि चढ़ाया जाता है. वो इसलिए कि अगर आप भगवान शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं तो सबसे पहले उनके प्रिय को प्रसन्न कीजिए.

नंदी बह्ग्वान शिव के प्रिय कैसे बन गए, जबकि उनके गले में सांपों का घेरा रहता है.

भला किसी एक के इतने करीब होने पर कोई और कैसे उनका प्रिय बन सकता है. इसके पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है. पुराणों के अनुसार एक बार ब्रह्मचारी व्रत का पालन करते हुए शिलाद ऋषि को यह भय सताने लगा कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनका पूरा वंश समाप्त हो जाएगा, इसलिए उन्होंने एक बच्चा गोद लेने का निर्णय किया.

ये ऋषि एक ऐसे बालक को गोद लेना चाहते थे, जिसपर भगवान शिव की अपार कृपा हो. ऐसे में ऋषि भगवान् शिव की आराधना करने लगें.

ऋषि कठोर तपस्या करते रहे, लेकिन उन्हें भगवान की कृपा प्राप्त नहीं हुई. वो फिर से तपस्या करना शुरू किये. उनकी तपस्या का उद्देश्य किसी आम बच्चे को पाना नहीं, बल्कि एक ऐसी संतान को अपनाना पाना था, जिसपर भगवान शिव का आशीर्वाद हो और वह असामान्य रूप से आध्यात्मिक हो. ऋषि ने अपनी तपस्या को और भी कठोर बना दिया. अंत में भगवान शिव को अपने भक्त के लिए आना पड़ा. शिव उस ऋषि से प्रसन्न हुए.

भगवान् को अपने समक्ष देखकर ऋषि की आँखें ही चुंधिया गई. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि स्वयं ईश्वर उनके सामने खड़े हैं. ऋषि ख़ुशी से भगवान् के चरणों में गिर पड़े. भगवान् शिव ने ऋषि से वरदान मांगने को कहा. ऋषि ने अपनी कामना भगवान् के समक्ष रख दी. भगवान् ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए. अगले ही दिन खेती करने के लिए वह खेत पर पहुंचे, जहां उन्हें एक खूबसूरत नवजात शिशु मिला. ऋषि बहुत खुश हुए, तभी भगवान् ने कहा कि यही तुम्हारी संतान है.

देखते देखते समय बीतता गया. नंदी बड़ा हो गया. एक दिन उस ऋषि के आश्रम पर दो सन्यासी आएं और उन्होंने कहा कि नंदी ज्यादा जीवित नहीं रहेगा. ये बात नंदी सुन लिए और जाकर भगवान् शिव की आराधना करने लगे. भगवान् प्रसन्न हुए, उन्होंने न केवल नंदी को वरदान दिया बल्कि बैल का मुख देकर उन्हें अपना वाहन बना लिया.

इस तरह से नंदी बैल भगवान शिव के प्रिय वाहन बन गए. वो अजर और अमर हो गए. आज लोग भगवान् शिव के साथ ही उनकी भी पूजा करते हैं.

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