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भस्मासुर के खौफ से डरकर इस जगह पर छुपे थे भगवान शिव !

भस्मासुर

भस्मासुर –  भगवान शिव ने कभी भी अपने भक्तों के साथ भेदभाव नहीं किया यही वजह है कि असुर, देवता या सामान्य मनुष्य में से जो भी भगवान शिव को सच्चे मन और श्रद्धा से याद करता है वो उन्हें अपना बना लेते हैं और उनकी समस्त इच्छाओं को पूरी करते हैं.

भगवान शिव कभी अपने भक्तों को निराश नहीं करते हैं यही वजह है कि एक बार भस्मासुर नाम के दैत्य ने उनकी तपस्या की और शिव उसपर प्रसन्न हुए. जिसके बाद भस्मासुर ने भगवान शिव से ऐसा वरदान मांग लिया जो स्वंय उनके लिए आफत बन गया.

शिव ने दिया भस्मासुर को ये वरदान

भस्मासुर ने भगवान शिव से कहा कि वो उसे ऐसा वरदान दें कि जब भी वह किसी के सिर पर अपना हाथ रखे तो वह व्यक्ति भस्म हो जाए. शिव ने उसकी यह बात मान ली.

जब भस्मासुर को शिव से यह वरदान मिला कि वह जिस किसी के भी सिर पर हाथ रखेगा, वह राख में बदल जाएगा तो सबसे पहले उसने शिव को ही अपना शिकार बनाने की कोशिश की.

शिव अपने द्वारा दिए गए वरदान को वापस नहीं ले सकते थे इसलिए महादेव को स्वयं भस्मासुर से अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भटकना पड़ा.

भस्मासुर के डर से यहां छुपे थे शिव

मान्यताओं के अनुसार भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़ के जंगलों की गुफाओं में छुपे हुए थे. उनकी जटाओं के अवशेष जो पत्थरों में तब्दील हो गए थे वो आज भी यहां देखने को मिलते हैं.

यहां भगवान शिव का एक अति प्राचीन मंदिर भी स्थित है. इस मंदिर की खासियत यह है  कि 50 फीट तक घुटनों और कोहनियों पर रेंगते हुए जाने के बाद ही शिव के दर्शन हो पाते हैं.

जटाशंकर के नाम से प्रसिद्ध है ये मंदिर

घने जंगल में गुफा के भीतर स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर जटाशंकर के नाम से प्रसिद्ध है. इसका नाम जटाशंकर इसलिए पड़ा क्योंकि इस प्राचीन शिवलिंग में जटाओं जैसी आकृति साफ दिखाई देती है.

हालांकि इस मंदिर से कई मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर में स्थित शिवलिंग पर कुदरती रुप से जल की बूंदे अपने आप गिरती हैं. सालभर यहां प्राकृतिक रुप से पहाड़ से रिसता हुआ ठंडा पानी पीने को मिलता है.

पैदल चलकर ही कर सकते हैं दर्शन

भगवान शिव के इस प्राचीन मंदिर में पहुंचने के लिए सिर्फ पैदल जाने का ही मार्ग है. इसके लिए मनेंद्रगढ़ विकासखंड के अंतर्गत आनेवाले ग्राम पंचायत बिहारपुर के बैरागी से लगभग 12 किमी दूर घने जंगल में पैदल चलना पड़ता है.

12 किलोमीटर की यात्रा तय करने के बाद एक पहाड़ी मिलती है जिसे देखकर ऐसा महसूस होता है कि कोई सर्प फन फैलाकर बैठा हो. इस पहाड़ी के अंदर लगभग 50 फीट से ज्यादा घुटनों और कोहनियों के बल ही चलकर मंदिर के अंदर पहुंचा जा सकता है.

बहरहाल मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव को भस्मासुर से अपने प्राण बचाने के लिए घने जंगलों के बीच बसी इस पहाड़ी के भीतर छुपना पड़ा था. जिसका अहसास आज भी इन वादियों में आकर महसूस किया जा सकता है.

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