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जब सोमनाथ मंदिर को बचाने के लिए 50 हजार हिन्दू हुए थे शहीद ! आखिर क्यों इन शहीदों को भूल गया भारत ?

सोमनाथ मंदिर को बचाने

इतिहास हमेशा वर्तमान पर हमले करता है और वर्तमान को बचाने के लिए बलिदान दिया जाता है तब यही वर्तमान फिर इतिहास बनता है.

हिन्दुओ का इतिहास काफी संघर्षपूर्ण रहा है.

एक समय था जब हिन्दू अपने देश में शांतिपूर्वक रहते थे.  इस देश को सोने की चिड़िया बोला जाता था.

तभी कुछ इंसानियत के दुश्मन देश में आते हैं और इस देश की शांति भंग हो जाती है. यहाँ लूट होती है. महिलाओं की इज्जत उतारी जाती हैं. बच्चों का क़त्ल होता है. हिन्दुओं के धार्मिक स्थान को तोड़ा और लूटा जाता है.

ऐसा ही कुछ सोमनाथ मंदिर के बारे में बोला जाता है.

सोमनाथ मंदिर को बचाने

इस सोमनाथ मंदिर को लूटने के लिए महमूद गजनवी अपनी विशाल सेना लेकर आया था.

तो आज हम आपको बताने वाले एक ऐसी कहानी, जो हिदुओं के लिए गर्व की बात है. यह कहानी है सोमनाथ मंदिर को बचाने के लिए बलिदान की, यह कहानी है अमर शहीदों के बलिदान की.

तो आइये पढ़ते हैं सोमनाथ मंदिर को बचाने की पूरी कहानी –

सोमनाथ मंदिर को बचाने का पहला इतिहास क्या बोलता है –

सोमनाथ मंदिर को बचाने

सरन प्रकाशन मंदिर मेरठ से प्रकाशित ‘‘भारत वर्ष का इतिहास’’ – ‘‘मंदिर की सेवा के लिए 10 हजार गांव लगे थे. मंदिर में 100 पुजारी, 500 नर्तकियां तथा 200 गायक दर्शकों को भगवान के गीत सुनाया करते थे. मंदिर की अपार सम्पत्ति से ललचाकर महमूद अजमेर के रास्ते सोमनाथ के द्वार पर जा पहुंचा. राजपूतों ने मंदिर की रक्षा के लिए घमासान युद्ध किया, लगभग 50 हजार हिंदू मारे गए.

सोमनाथ मंदिर को बचाने का दूसरा इतिहास क्या कहता है –

सोमनाथ मंदिर को बचाने

सोमनाथ मंदिर की रक्षा के प्रयास में कोई 50 हजार हिंदू मंदिर के द्वार पर मारे गए और सोमनाथ मंदिर तोड़कर महमूद ने कोई 2 करोड़ दीनार की सम्पत्ति लूट ली.’’ (पृ0, 261-262)

सोमनाथ मंदिर को बचाने का तीसरा इतिहास की पढ़ लें –

डॉ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात’ जी की पुस्तक ‘‘क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म ?’’

उसके पेज न 203 पर सोमनाथ मंदिर के विषय में लिखा है, जब महमूद की सेना ने नरसंहार शुरू किया, तब हिंदुओं का एक समूह दौड़ता हुआ मंदिर की मूर्ति के सामने धरती पर लेट कर उससे विजय के लिए प्रार्थना करने लगा. हिंदुओं के ऐसे दल के दल मंदिर में प्रवेश करते, जिनके हाथ गरदन के पास जुड़े होते, जो रो रहे होते और बड़े भावावेश पूर्ण ढंग से सोमनाथ की मूर्ति के आगे गिड़गिड़ा कर प्रार्थनाएं कर रहे होते. फिर वे बाहर आते, जहां उन्हें कत्ल कर दिया जाता. यह क्रम तब तक चलता रहा जब तक कि हर हिंदू कत्ल नहीं हो गया. (देखेंः सर एच.एच. इलियट और जान डाउसन कृत ‘द हिस्ट्री आफ इंडिया एज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियनस’ पृ0 470)
(यह सभी सबूत आप भी जांच सकते हैं)

तो अब आखिर सच भी पढ़ लीजिये –

सोमनाथ मंदिर को बचाने

लेकिन क्या वाकई वहां हिन्दुओं का कत्लेआम हुआ था?

तो इसका जवाब हाँ है. इतिहास की सबसे अच्छे दस्तावेजों वाली पुस्तक पूर्ववर्ती मुस्लिम आक्रान्ताओं का भारतीयों द्वारा प्रतिरोध, नामक यह पुस्तक बताती है कि जब महमूद ने सोमनाथ के योधाओं को बचने के लिए मुस्लिम बनने की शर्त राखी तो सभी ने इस शर्त को नकार दिया था. अंत में जब लड़ाई हुई तो इस मंदिर की रक्षा में 50 हजार हिन्दुओं ने अपनी जान दी थी.

इस तरह के बलिदान की कहानी किसी भी इतिहास में नहीं मिलती है.

सभी हिन्दू जानते थे कि अब हमको मरना ही है लेकिन वह अपना धर्म छोड़ने को तैयार नहीं हुए. यह लड़ने वाले योधा सभी जाति से थे. यह लोग सोमनाथ मंदिर को छुते थे और युद्ध के मैदान में चले जाते थे.

बड़े दुःख की बात है कि आज भारत के लोग सोमनाथ मंदिर को बचाने के लिए किये हुए बलिदान को जानते तक नहीं है.

बच्चों की किताबों से यह वीर इतिहास गायब है. तीनों इतिहास की किताबों में यह लिखा हुआ है कि कैसे हिन्दुओं ने सोमनाथ मंदिर को बचाने के लिए अपने प्राण भी दिए थे.

हिन्दुओं पर इतना अत्याचार कभी नहीं हुआ है, जितना कि मुस्लिम शासकों के बीच हुआ था.

हिन्दुओं के अधिकार तब खत्म कर दिए गये थे.

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