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पाक के कब्जे में हजारों साल से कैद है कश्मीरी पंडितों की कुलदेवी !

कश्मीरी पंडितों की कुलदेवी

कश्मीरी पंडितों की कुलदेवी – सन् 1947 में आजादी के लिए देश को क्या कीमत चुकानी पङी वो किसी से छिपी नही ।

अंग्रेज तो चले गए लेकिन उनके जाने के बाद देश के दो हिस्से भारत और पाकिस्तान । भारत –  पाक के इस विभाजन में कई लोग बिछङे , कई लोग बेघर हुए । लेकिन इस विभाजन का कोई केन्द्र बना तो वो था कश्मीर । जहाँ के लोग  आज भी उसकी कीमत चुका रहे हैं।

आजादी की लङाई में कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान में चला गया । जिसे आज pok कहा जाता है ।

कश्मीरी पंडितों की कुलदेवी

कश्मीर में आजादी से पहले मुस्लिम समुदाय  और कश्मीर पंडित मिलजुलकर रहा करते थे। कश्मीर का जो हिस्सा pok में गया वहां कश्मीरी पंडितों की कुलदेवी माता शारदा का शक्तिपीठ है। शक्तिपीठ पाकिस्तान के हिस्से में होने के कारण कश्मीरी पंडितों को वहाँ जाने की इजाजत नहीं है । आलम ये है कि पिछले 70 साल में वो भव्य मंदिर अब खंडर बन गया है। जिसके आस -पास आतंकवादियो का घेरा है । पहले जहां कश्मीरी पंडित माता शारदा की पूजा करते थे । जिस मंदिर में हर वक्त घंटियों क आवाज सुनाई देती थी अब वहां सिर्फ गोलियों की आवाज सुनाई देती है। कश्मीर पंडितों ने सेव शारदा नाम से एक संगठन बनाया है जो शारदा शक्तिपीठ के इस मंदिर में जाने की लगातार कोशिशें कर रहा है लेकिन अब तक सफल नही हो पाया है।

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कश्मीर में शारदा शक्तिपीठ ही नही कश्मीरी पंडितों की हालत खराब घाटी के अधिकतर पंडित देश के अलग अलग राज्य में शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं।हालांकि जम्मू कश्मीर में मौजूद कश्मीरी पंडितों का संगठन पूरी कोशिश कर रहा है कि कश्मीरी पंडितों को पीओके में जाकर शारदा शक्तिपीठ में पूजा करने की अनुमति  मिल जाए। लेकिन पीओके में जाने के लिए परमीट तैयार करवाना पङता है। और इसके बाद भी कोई गारंटी नही है कि वहाँ के लोग आपको मंदिर में पूजा करने की अनुमति दे दे। पीओके परमीट  के लिए वहाँ आपका कोई रिश्तेदार होना जरुरी होना चाहिए । परमिट सिर्फ शादी , घर में कोई फंक्शन , डेथ पर ही मिलता है।

कश्मीरी पंडितों की कुलदेवी – हालांकि पीओके में आतंकवादियो के कब्जे में भले ही हो । लेकिन वहां कई लोग ऐसे भी हैं जो कश्मीरी पंडितों की इस आस्था को बहुत अच्छे से समझते हैं और जिस वजह से कश्मीरी पंडितों के संपर्क में रहते हैं मंदिर की जानकारी कश्मीरी पंडितों को देते रहते हैं।

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