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गलत होने पर गलती का अहसास होना ज़रूरी हैं.

feeling-guilty

यह बात सर्वविदित हैं कि हमने इस दुनिया में अगर इंसान के रूप में जन्म लिया है तो हमसे गलतियाँ अवश्य होंगी और फिर एक जुमला भी प्रचलित हैं “नो वन इज़ परफेक्ट इन दिस वर्ल्ड”.

जिसने भी यह बात कही हैं बहुत सोच समझ कर कहीं हैं कि कोई भी इंसान पूरी तरह से कभी सही नहीं हो सकता उससे कोई न कोई गलती ज़रूर होती हैं.

लेकिन उस इंसान द्वारा हुई गलती का एहसास उसे ज़रूर होना चाहियें क्योकि अपने द्वारा हुई इस गलती का भाव ही उसे आगे इस तरह की गलतियाँ करने से रोकता हैं. इंसान के भीतर इस गलती से उत्पन्न हुई ग्लानि ही उसे सम्पूर्ण होने की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं और भविष्य में गलतियाँ न दोहराने के लिए प्रोत्साहित करती हैं.

अपने द्वारा किये गए गलत काम और उस गलती के एहसास से जुड़ी एक कहानी हम आप सब को सुनाते हैं, जो बहुत शिक्षाप्रद हैं.

पुराने समय में पैंठन नाम के किसी गाँव में एकनाथ महाराज नाम के संत हुआ करते थे, जो अपने शांत और संयमित व्यवहार के जाने जाते थे. कहा जाता था कि उन्हें कभी क्रोध नहीं आता था. किसी रोज़ गाँव में खाली बैठे कुछ दुराचारियों ने एक घोषणा कर दी कि जो व्यक्ति एकनाथ महाराज को गुस्सा दिला देगा उसे 200 रुपये इनाम दिए जायेंगे. पैसे की लालच में आकर एक ब्राह्मण युवक ने उन लोगों से कहा कि मैं महाराज को क्रोध दिला सकता हूँ.

अपनी इस शर्त के चलते वह युवक एकनाथ महाराज के घर पंहुचा और देखा कि उस समय महाराज पूजा में लीन हैं. उन्हें क्रोधित करने के उद्देश्य से वह ब्राह्मण युवक एकनाथ महाराज की गोद में जा कर बैठ गया. उसने सोचा था कि इस तरह पूजा में व्यवधान उत्पन्न होने के कारण महाराज तो अवश्य उस पर गुस्सा करेंगे और वह शर्त जीत जायेगा. लेकिन इस के विपरीत महाराज ने उस युवक को देखकर बिना क्रोधित हुए कहा- ब्राम्हण..तुम्हे देख कर प्रसन्नता हुई. मुझसे कई लोग मिलते हैं, लेकिन तुम्हारा प्यार जताने का तरीका सबसे अलग हैं. महाराज की इस प्रतिक्रिया से वह युवक पूरी तरह चौंक गया. उसे यह समझ में आ गया कि इन्हें गुस्सा दिलाना आसान काम नहीं हैं. लेकिन शर्त के पैसे की लालच ने उसकी हिम्मत नहीं तोड़ी और वह दुबारा प्रयास करने का सोचने लगा.

पूजा कर के उठे एकनाथ महाराज जब भोजन करने बैठे और उनकी पत्नी उन्हें भोजन परोसने आई और झुकी तब वह  युवक महाराज को क्रोधित करने के उद्देश्य से उनकी धर्मपत्नी की पीठ पर किसी बच्चे की भांति चढ़ गया. महाराज ने इस बात पर क्रोधित होने बजाये अपनी पत्नी से यह कहा कि- देखना कही ब्राहमण गिर न पड़े. उनकी पत्नी ने कहा कि- मुझे अपने बच्चे को पीठ में लाद कर काम करने की आदत हैं, फिर कैसे इस बच्चे को मैं गिरने दूंगी.

महाराज और उनकी पत्नी की इन बातों से वह युवक अब शर्म से पानी पानी हो चूका था. उसके पास अपनी इस अभद्रता के विषय में कहने के लिए कुछ  भी नहीं था. उस ब्राहमण को अपने द्वारा की गयी इस गलती की ग्लानि होने लगी. एकनाथ महाराज युवक की इस मनोदशा को भलीभांति समझ चुके थे और इसको देखते हुए उन्होंने उस युवक से कहा-

मैं चाहता तो उसी समय तुम क्रोध कर के तुम्हे अभद्रता करने से रोक सकता था, लेकिन ऐसे में तुम्हे अपनी गलती का एहसास नहीं हो पाता और तुम आगे भी ऐसी गलतियाँ करते. हमें अपने द्वारा की गयी गलती का अहसास होना ज़रूरी हैं.

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