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एक समय था जब इसरो बैलगाड़ी और साइकल से राकेट भेजता था

इसरो

आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के राकेट मिनटों में धरती से मंगल की दूरी नाप सकते हैं.

लेकिन एक समय था ऐसा भी जब इसरों के राकेट साइकल और बैलगाड़ी में लदकर प्रक्षेपण के लिए जाते थे.

इसरो ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में जो मील का पत्थर स्थापित किया है उसका सफर बैलगाड़ी से शुरू होकर आज उस मुकाम तक पहुंच गया है कि जहां भारत एक साथ 104 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने की काबलियत रखता है.

आपको बता दें कि इसरो की यात्रा भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रमों के जनक माने जाने वाले डॉ विक्रम ए साराभाई की सूझबूझ से शुरू हुई. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में उसका जन्म हुआ और वहां से शुरू होकर अंतरिक्ष कार्यक्रम बना, फिर इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन बना.

आप को जानकर हैरानी होगी कि शुरूआत में इसरों को इतनी सुविधाएं नहीं थी जितनी कि आज है. उस दौर में यदि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम आगे बढ़ा तो इसके पीछे इसरों के वैज्ञानिकों के साथ वहां काम करने वाले लोगों की तपस्या थी.

इन लोगों के समर्पण और त्याग की बदौलत ही इसरो ने छोटे-छोट कदमों से चलकर बड़े सपने पूरे किए हैं.

बतातें चलें कि सबसे पहले एक छोटा सा उपग्रह आर्यभट्ट छोड़ा गया उसके बाद रॉकेट बने. पहला रॉकेट फेल हो गया था. पहला रॉकेट फेल हो जाने के बाद उसमें सुधार के लिए जो कदम उठाए गए थे उसमें कलाम साहब का बहुत बड़ा योगदान था.

इन लर्निंग स्टेप्स से इसरो ने बहुत कुछ सीखा. इसके बाद सैटेलाइट लॉन्च व्हिकल (एसएलवी) 3 रॉकेट बना जो कामयाब रहा.

धीरे धीरे इसरो ने छोटे उपग्रह बनाए फिर बड़े उपग्रह बनाए और आज स्थिति ये है कि भारत अपने सारे संचार उपग्रह खुद ही बनाता है. अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट्स के क्षेत्र में भी भारत ने काफी तरक्की की है.

आज भारत के पास अर्थ इमेजिंग के ऐसे सैटेलाइट्स हैं जिनकी मदद से जहां पहले धरती में 6 मीटर दूरी तक की चीजें देखी जा सकती थीं, वहीं आज एक मीटर से कम दूरी तक की चीजें देखी जा सकती हैं.

इतना ही नहीं अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज चाहें तो अपने घर या दफ्तर में बैठे हुए ये देख सकते हैं कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री या अमरीका के राष्ट्रपति के पार्किंग में कितनी गाड़ियां खड़ी हैं. आप अंतरिक्ष से जमीन पर खड़ी कार का नंबर तक पढ़ सकते हैं.

ये यात्रा इतनी आसान नहीं थी. इसके काफी उतार चढ़ाव आए. जब रूस ने अमेरिका और दुनिया के बाकी देशों के दवाब मे भारत को क्रायोजनिक तकनीक देने से मना कर दिया तो इसरों ने इसको अपने ही देश में बनाकर बता दिया कि वे भी किसी से कम नहीं है.

जानकर गर्व होगा कि साल 2008 में इसरों ने अपने चंद्रयान अभियान में पहली बार बताया कि चांद पर पानी के कण हैं. जबकि वर्ष 1969 में पहली बार चांद पर जाने वाली अमरीकी स्पेस एजेंसी नासा दर्जनों बार चांद पर गई लेकिन बावजूद इसके वह वहां पानी की मौजूदगी का पता नहीं लगा पाई.

इसी तरह वर्ष 2013 में भारत ने अपने पहले ही प्रयास में अपने मंगलयान को मंगल ग्रह पर भेजने में कामयाबी हासिल की. अमरीका, रूस और चीन समेत कोई भी देश मंगल ग्रह पर अपनी पहली कोशिश में पहुंचने में सफल नहीं हो पाया था.

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