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जानते हैं आखिर क्यों मुस्लिम धर्म में ब्याज लेने को माना जाता है हराम !

मुस्लिम धर्म में ब्याज

मुस्लिम धर्म में ब्याज – आपने मुस्लिम धर्म से ताल्लुक रखनेवाले लोगों के मुंह से ये सुना ही होगा कि उनके धर्म में ब्याज लेने को हराम माना जाता है.

अर्थशास्त्र और गणित की भाषा में भले ही ब्याज को मूलधन का किराया या शुल्क माना जाता है लेकिन इस्लाम में इसे अनुचित माना गया है.

आखिर क्यों मुस्लिम धर्म में ब्याज के रुप में आनेवाले पैसों को हराम माना जाता है!

चलिए हम आपको बताते हैं इससे जुड़ी अहम बातें.

मुस्लिम धर्म में ब्याज – 

मुस्लिम धर्म में ब्याज शोषण का एक जरिया है 

इस्लाम धर्म के अनुसार ब्याज एक ऐसी व्यवस्था है जो अमीर को ज्यादा अमीर और गरीब को ज्यादा गरीब बनाती है. इसलिए मुस्लिम धर्म में ब्याज लेने की व्यवस्था को गरीबों के शोषण का एक जरिया माना जाता है.

इस्लाम धर्म के पवित्र धार्मिक ग्रंथ कुरान में स्पष्ट रुप से ब्याज को वर्जित माना गया है. इस्लाम में इंसानों के लिए कहा गया है कि ऐ ईमानवालों दो गुना और चार गुना करके ब्याज मत खाया करो और अल्लाह से डरो.

मुस्लिम धर्म में ब्याज लेने से नहीं होती है बरकत

इस्लाम धर्म के अनुसार ब्याज खाने वालों के घर से बरकत खत्म हो जाती है. कहा जाता है कि मोहम्मद साहब के दिव्य संदेश से पहले अरब निवासियों में ब्याज की प्रथा बड़े पैमाने पर प्रचलित थी.

इस प्रथा से अमीरों को तो बहुत फायदा होता था लेकिन गरीब बेचारे इस ब्याज के बेरहम मार से खुद को नहीं बचा पाते थे. मोहम्मद साहब ने खुद भी गरीबी में जीवन बिताया था और उन्होंने इस प्रथा से कई लोगों को कष्ट उठाते हुए देखा था.

कुरान में बताया गया है कि जो लोग ब्याज हांसिल करने का निश्चय कर चुके हैं और उसके लिए बहाने बनाते हैं तो यह एक शैतानी धोखा है. जो लोग ब्याज खाते हैं उनके बारे में कहा गया है कि वे कयामत के दिन खड़े नहीं हो सकेंगे.

व्यापार है वैध लेकिन ब्याज है अवैध

कुरान में व्यापार को वैध बताया गया है लेकिन ब्याज को पूरी रह से अवैध बताया गया है. कुरान में साफ तौर पर यह संदेश दिया गया है कि जो लोग इस हिदायत के बाद ब्याज लेना बंद कर देंगे उनका मामला अल्लाह को सुपुर्द है.

लेकिन तमाम जानकारी के बाद भी जिसने ब्याज लेना जारी रखा तो उसका जीवन नरक के समान है जिससे उसे मुक्ति नहीं मिल सकती. इस्लाम धर्म की मान्यता के अनुसार ब्याज हमारे धन में बरकत नहीं बल्कि उसे और कम कर देता है.

जो लोग ब्याज का पैसा खाते हैं उनके लिए कहा जाता है कि जब कयामत आएगा तो ऐसे लोग उस वक्त खड़े तक नहीं हो सकेंगे.

आपको बता दें कि इस्लाम धर्म में यह माना जाता है कि जो इंसान जितना दान पुण्य करता है उसके धन में उतनी ही ज्यादा बरकत होती है इसलिए कहा जाता है कि चाहे इंसान मुस्लिम  हो या गैर मुस्लिम, उसे ब्याज लेने से बचना चाहिए.

 

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