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इतिहास के ये महान सूफी संत जिन्होंने ख़ुदा को माशूक की तरह पूजा

भारत के सूफी संत

भारत के सूफी संत – दुनिया में प्रत्येक धर्म के दो पहलू होते हैं. एक बाहरी और दूसरा आंतरिक. सूफी मत इस्लाम धर्म की आंतरिक विचारधारा को स्पष्ट रूप से उभार कर सामने लाने वाला पंथ है. इसीलिए इन्हें रहस्यवादी भी कहा गया है. सूफी मत के लोगों के जीवन का आधार भक्ति को प्रेम के रूप में देखने और निभाने का रहा है.

उनका उद्देश्य इसी प्रेम से उपजे स्नेह के द्वारा मानव कल्याण करना है.

भारत के सूफी संत

भारत के सूफी संत – सूफी विचारधारा

सूफी ईश्वर की एकात्म छवि में विश्वास करते हैं. इस जहां में ईश्वर के अंदर ही सब कुछ सिमटा हुआ है, बाहर जो भी है वो उसका प्रतिबिंब मात्र है. एक प्राणी अपना सब कुछ फ़ना करके ही ख़ुदा को पा सकता है. साधारण जीवन हमारे भीतर सात्विकता का विकास करता है, जिससे की हम सांसारिकता से अलगाव करके भक्ति की तरफ बढ़ चलते हैं. जिस तरह एक प्रेमी अपने दूसरे प्रेमी को स्नेह करता है. उसी तरह हमें भी ख़ुदा में मिल कर ख़ुदा की इबादत करनी चाहिए.

प्रेमी जैसे न हिन्दू देखता है न मुसलमान देखता है वैसे ही सूफी मतानुसार ख़ुदा जात-पात से दूर केवल ईमान देखता है.

वो महान सूफ़ी संत जिन्होंने ख़ुदा में फ़ना होना सिखाया

अबू यजीद अल बिस्तामी

सूफी मत में इनका स्थान सबसे ऊपर है. अबू यजीद ने ही दुनिया को ‘फ़ना’ शब्द से रूबरू करवाया. इनका कहना था कि अपना अस्तित्व ख़ुदा में विलीन करने के बाद ही हम परम् आंनद को प्राप्त कर सकते हैं.

भारत के सूफी संत

मंसूर हल्लाज-

इनका मानना था कि एक सामान्य व्यक्ति भी ईश्वर का रूप हो सकता है. इन्होंने इस तरह अपने आप को अनहलक घोषित किया जिसका अर्थ होता है ‘मैं ही ईश्वर हूँ’. इस घोषणा के बाद उन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया था. मंसूर ने सूफी मत से जुड़ी अनेक रचनाओं को लिखा था, जिनमें ईश्वर की व्यापकता को बताया गया था.

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अबू हामिद मोहम्मद अलगलाजी-

आध्यात्मिक शांति के लिए इन्होंने खानकाह का निर्माण किया था. सूफी मत में इनकी रचनाओं का भी अहम योगदान है.

भारत के सूफी संत –

सूफीवाद में चौदह सिलसिले (शाखा) बने लेकिन भारत में केवल चार सिलसिले ही प्रमुख रूप से देखे जाते हैं. भारत में आने वाले पहले सूफी संत शेख इस्माइल थे जो लाहौर आए थे. 12वीं सदी में मोहम्मद गोरी के साथ ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती भारत आए. इन्होंने भारत में चिश्ती सिलसिले की नींव रखी.

ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती-

इन्होंने अपनी ख़ानक़ाह राजस्थान के अजमेर में बनाई. इनके प्रमुख शिष्य शेख़ हमीदउद्दीन नागौरी और कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी थे. मुइनुद्दीन चिश्ती को ‘ख़्वाजा गरीब नवाज’ के नाम से भी जाना जाता है. मुगल सम्राट अकबर ने अजमेर दरगाह की दो बार पैदल यात्रा की थी. इनकी दरगाह पर संगीत समारोहों (समा) का आयोजन होता रहता था.

शेख़ फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर-

इन्हें ‘बाबा फरीद’ के नाम से जाना जाता था. अजोधन में इनकी ख़ानक़ाह थी. सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक बाबा फरीद से काफी प्रभावित थे. गुरु ग्रन्थ साहिब में भी बाबा फरीद के प्रवचनों को शामिल किया गया है.

शेख़ निजामुद्दीन औलिया-

इन्हीं के समय में भारत में सूफी मत का सबसे ज्यादा प्रचार-प्रसार हुआ. इनकी ख़ानक़ाह गयासपुर (दिल्ली) में है. इन्हें महबूबे इलाही, सुल्तानुल औलिया, योगी सिद्ध के नाम से भी जाना जाता है. अमीर खुसरो इनके सबसे प्रिय शिष्य थे. इनके अलावा इनके शिष्यों में सिराजुद्दीन उस्मानी, नासीरूद्दीन चिराग-ए-देहलवी, शेख बुरहानुद्दीन गरीब भी प्रमुख थे.

निजामुद्दीन औलिया ने अपने जीवनकाल में दिल्ली में सात सुल्तानों का काल देखा था. वे एकमात्र चिश्ती संत थे जिन्होंने विवाह नहीं किया था.

निजामुद्दीन औलिया ने मुगल सल्तनत के सम्राट गयासुद्दीन तुगलक द्वारा उन्हें दिल्ली छोड़ देने की बात पर कहा था- ‘हनूज दिल्ली दूर अस्त’ अर्थात दिल्ली अभी दूर है. सम्राट जब शेख निजामुद्दीन को दिल्ली से बाहर भेजने का हुक्म देने के लिए दिल्ली लौट रहे थे, उससे पहले ही एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी.

भारत के सूफी संत

इनके अलावा चिश्ती सिलसिले में ख्वाजा सैय्यद मुहम्मद गेसुदराज, शेख सलीम चिश्ती, शेख अब्दुल कुद्दुस गंगोही, कलीमुल्लाह जहानाबादी, शेख निजामुद्दीन फारूकी प्रमुख थे.

सुहरावर्दी सिलसिले में भारत में शेख बहाउद्दीन जकारिया, सैय्यद जलालुद्दीन जहानियाँ जहांगश्त प्रमुख थे.

इन सबके अलावा फ़िरदौसिया, कादिरिया, नक्शबंदी, शत्तारिया, कलन्दरिया, मदारिया भी प्रमुख सूफी सिलसिले हुए हैं.

सूफी संतों ने इंसानियत को प्रमुखता से देखा. भारत के सभी सूफी संतों ने हमेशा हिन्दू-मुसलमान एकता पर बल दिया. प्राणायाम से लेकर कई हिंदू धर्म ग्रन्थों की शिक्षाओं को सूफी मतों में शामिल किया गया है.

ये है भारत के सूफी संत – ईश्वर को पाने के लिए एक अलग शैली देने वाले इस मत ने हमेशा प्राणिमात्र से प्रेम को सर्वोच्च रखा. एक प्रसिद्ध महिला सूफी संत रबिया ने कहा था- ईश्वर प्रेमिका है और साधक उसका आशिक. ईश्वर के प्रति इस प्रेम को ‘इश्क हकीकी’ कहा जाता है जो कि सामान्य प्रेम ‘इश्क़-ए-मिजाजी’ से कद में काफी ऊंचा और श्रेष्ठ होता है.

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