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गुमनामी में दम तोड़तीं बचपन की माँ वाली लोरियाँ !

माँ वाली लोरियाँ

माँ वाली लोरियाँ

मुझको लाकर दे दो, मेरा बचपन

मेरा रूठना, वो मेरा रोना, माँ का प्यार

मेरा माटी में खेलना,

और अगर बचपन ना ला सको तो,

माँ से बोलो बस अपनी लोरियां सुना दे,

Mother's Lullaby

बचपन अब जैसे खो सा चुका है. कहाँ चला गया? खोजो तो कहीं मिलता भी नहीं है. आपको भी जरूर याद आता होगा, वो नटखट वक़्त, छोटे- छोटे पैर जब मीलों की दूरियां तय करते थे. आम-अमरूद की चोरियां, तो खुले आम करते थे. लड़ते थे- झगड़ते थे, पूरा दिन तफरी रहती थी और अंत में जब रात आती थी, तो सबसे हसीन पल आता था, जब माँ हमें लोरियां सुनाया करती थी.

लेकिन आज की पीढ़ी को कहाँ मिलता है लोरियों वाला प्यार? आज का बचपन तो गुज़रता है, वीडियो गेम्स में, टेलीविज़न पर, मोबाइल्स में, थोड़ा वक़्त बचता है तो वो चला जाता है लूंगी डांस के अन्दर. आपको याद तो आ ही गया होगा बचपन अपना, चलिए वो सब अब जाने दीजिये, आपको लेकर चलते हैं, बचपन की ‘लोरियों’ की दुनिया में.

चंदा मामा दूर के
पुए पकाए पूर के
आप खाए थाली में
मुन्ने को दे प्याली में

प्याली गयी टूट, मुन्ना गया रूठ
लायेंगे नयी प्यालियाँ बजा बजा के तालियाँ
मुन्ने को मनाएंगे, हम दूध मलाई खायेंगे

माँ वाली लोरियाँ

अक्सर ये लोरी माँ बचपन में तब सुनाती थी जब, रात में हम खाना खाने से मना कर रहे होते थे और हाथ में खाने की थाली लेकर मम्मी भी यही पंक्तियाँ सुना-सुना कर खाना खिला ही देती थीं, माँ वाली लोरियाँ.

लल्ला लल्ला लोरी दूध की कटोरी

दूध में बताशा मुन्नी करे तमाशा

छोटी-छोटी प्यारी सुन्दर परियों जैसी है

किसी की नज़र ना लगे मेरी मुन्नी ऐसी है

शहद से भी मीठी दूध से भी गोरी

चुपके-चुपके, चोरी-चोरी,

लल्ला लल्ला लोरी …

आपको शायद याद हो कि बचपन में जब-जब आपने, दूध पीने से मना किया तब-तब आपको चंदा मामा की लोरी सुनने को मिली होगी. वैसे इस लोरी की खासियत यह है कि इसमें कभी भी लड़का और लड़की का भेद नही किया गया. बेटा हो या बेटी, सभी के लिए इसमें प्यार वही बराबर का रहा. लड़के के लिए इसमें मुन्नी की जगह बस मुन्ना लगा दिया जाता था.

आजा निंदिया आजा,

नैनन बीच समां जा,

आजा निंदिया रानी आ जा,

आ जा रे तू आ निंदिया,

आजा प्यारी निंदिया,

और जब नींद नहीं आती थी तो, माँ बड़े प्यार से, सर पर हाथ फेरते हुए , ये लोरी जब सुनाती थीं, तो नींद पल में आ जाती थी. ऐसा लगता था कि जैसे हम चाँद-तारों की दुनिया में हों, दिनभर की सारी थकान, इन पंक्तियों के साथ ही उड़ जाती थी.

आज कितना दिल करता है, उस दौर जन्में बच्चों का कि माँ वाली लोरियाँ काश फिर से एक बार, माँ ही सुना दे. हमारा खोया बचपन माँ ही है, जो बस वही लौटा सकती हैं. लेकिन आज बचपन में, कहाँ लोरियाँ सुनने को मिलती हैं? लेकिन हमारी ये कोशिश होनी चाहिए की लोरियाँ जिंदा रहें और कहीं ये गुमनामी में दम ना तोड़ दें.

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