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चंचल मन की शरारतों को संत भी ना रोक सके.

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“मन के हारे हर है, मन के जीते जीत”

यह कहावत इसलिए कही गयी है क्यों कि यदि व्यक्ति मन से सुदृढ़ नहीं है तो वह चाहे किसी भी उम्र में हो या कितना ही बड़ा संत – सन्यासी क्यों न हो, मन से हार ही जाता है.

मन की चंचलता, मन की शरारतें हर व्यक्ति को उसके आगे मजबूर कर देती है. मन की ख्वाहिशों पर नियंत्रण रखना आसन नही होता, लेकिन यही वह परीक्षा का समय होता है जब मन के घोड़े पर लगाम लगाने की स्थिति उत्पन्न होती है. आज ऐसा ही एक किस्सा हम आप के साथ बांटेंगे, जिसे पढ़ कर हम सब की ज़िन्दगी में मन की चंचलता पर लगाम लगाने की सीख मिलेगी.

पुराने किसी समय में एक संत हुआ करते थे, जो अपने संयम के लिए जाने जाते थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन एक  सन्यासी की तरह जिया और उनकी इसी दृढसंकल्प के चलते सभी लोग उन्हें बहुत सम्मान के भाव से देखते थे. अपनी कठिन तपस्या में उन्होंने ने अन्न का त्याग तो पहले ही कर दिया था लेकिन उन्हें दूध बहुत प्रिय था. उन्होंने एक बार ऐसे ही विचार किया कि जब उन्होंने ने जीवन के सभी भोगों पर नियंत्रण कर लिया है तो फिर दूध के लगाव पर क्यों  नहीं? इस बारे में सोचते सोचते उन संत ने तय किया कि अब से वह दूध का भी त्याग कर देंगे.

जब यह बात सभी लोगों को ज्ञात हुई तो हर किसी को आश्चर्य हुआ, लेकिन ऐसा करते हुए कई साल बीत गए उन्होंने दूध का सेवन नहीं किया. लेकिन एक दिन उन्हें यूँ ही ख्याल आया कि आज दूध पिया जाये और एक ख्याल के आते उनकी यही भावना हर रोज़ प्रबल होती गयी. अंततः उन्होंने एक धनी व्यक्ति के यहाँ भोज पर जाने के दौरान दूध पीने की इक्छा जताई.

सेठ संत की यह बात सुनकर दंग रह गया क्योकि उसे यह पता था कि संत ने दूध न पीने का संकल्प लिया है. लेकिन संत की बात के मानते हुए उसने शाम को संत की कुटिया के बाहर दूध से भरे 40 घड़े सामने रखवा दिया. संत वहां  पहुचते ही इतने दूध देखे तो सेठ से सवाल किया कि दूध तो मुझ अकेले को ही पीना है फिर आपने यह 40 घड़े क्यों रखवा दिए है?

सेठ ने कुछ देर सोच कर संत की बातों का जवाब दिया कि महाराज आपने 40 साल पहले दूध पीना छोड़ा था और उस हिसाब से यह 40 घड़े आप के लिए पार्यप्त रहेंगे.

संत सेठ की बात सुन कर समझ गए कि वह क्या कहना चाहता हैं और उन्हें अपनी भूल का एहसास होने लगा.

संत ने कहा कि इस सबक के बाद मुझे मन के टूटते नियंत्रण पर लगाम पा लिया है.

मनुष्य का मन किसी बच्चे की तरह होता है.

उसे खुद की अगली गति ज्ञात नहीं होती है. वह हर बार उछल-कूद करता है लेकिन उस पर नियंत्रण रखना भी हमारा ही कार्य है और यह नियंत्रण तपस्या और अभ्यास से आता है.

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