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कैसे आए समृद्धि? इसपर ओशो के कुछ अचूक मंत्र

हमारी ज़रूरतें जितनी कम हों, उतनी जल्दी हम समृद्ध हो जाते हैं. अगर ज़रूरतें ज़्यादा हों तो उतनी ही देर भी लगती है समृद्ध होने में. ज़रूरतें अगर बहुत ज़्यादा हों तो हम कभी समृद्ध नहीं हो सकते. वहीं, समृद्धि धन से नहीं आंकी जाती. समृद्धि तो धन और ज़रूरतों के बीच का फासला है. फासला कम है तो हम समृद्ध हैं, फासला नहीं है तो हम सम्राट हैं. इसी के साथ अगर फासला बहुत अधिक है तो समझो हम दरिद्र हैं.

अब मान लीजिए एक व्यक्ति की ज़रूरतें एक रुपए में पूरी हो जाती हैं और उसके पास दस रुपए हैं. वहीं, एक दूसरा आदमी है जिसके पास पांच अरब रूपए हैं लेकिन उसकी ज़रूरतें उसमें भी पूरी नहीं होतीं, तो अब दोनों में समृद्ध कौन है? पांच अरब वाले के पास उसकी ज़रूरतों से आधे रूपए हैं जबकि दस रूपए वाले के पास उसकी ज़रूरत से दस गुने. अब ज़ाहिर है कि समृद्ध दस रूपए वाला ही कहलाएगा.

सही मायनों में समृद्ध व्यक्ति ही धर्म में प्रवेश करता है लेकिन समृद्धि का अर्थ धन-संपत्ति से नहीं होता. हमारी ज़रूरतें इतनी कम हों कि हम जब भी, जैसे भी हों, वहीं समृद्ध होने का अहसास हो. जब ज़रूरतें थोड़ी होंगी, तो जल्दी पूरी हो जाएंगी. तभी हमारी जीवन-ऊर्जा धर्म की यात्रा पर निकलेगी. जब हमारी ज़रूरतें पूरी होंगी, तो हम दूसरे संसार की यात्रा पर निकल पड़ेंगे. तब हम तैयार होंगे दूसरे किनारे पर जाने के लिए. हम अपनी नाव खोल सकते हैं, खूटियां छोड़ सकते हैं, पाल फैला सकते हैं क्योंकि इस किनारे की हमारी ज़रूरतें पूरी हो चुकी हैं.

जितना हो सके हमें अपनी ज़रूरतों को घटाते रहना चाहिए और व्यर्थ को छोड़ते जाना चाहिए. जो बहुत ज़रूरी है, वो बहुत थोड़ा है. बहुत थोड़े में आदमी की तृप्ति हो जाती है. अपनी प्यास के लिए समुद्र की ज़रूरत नहीं बल्कि इसके लिए तो छोटा-सा झरना ही काफी होता है. भला समुद्र से कभी किसी की तृप्ति हुई है? धन तो समुद्र का खारा पानी है, जितना पीते हो, उतनी ही प्यास बढ़ती है. समुद्र का पानी पीकर आदमी मर सकता है, जी नहीं सकता. वहीं, छोटे से झरने का चुल्लू भर पानी पीकर भी तृप्त हुआ जा सकता है.

समृद्ध वही है जो अपनी ज़रूरतों को ज़रूरत समझता है और गैर-ज़रूरतों को गैर-ज़रूरत. सोने-चांदी से न तो आजतक किसी की प्यास बुझी है और न ही हीरे-जवाहरातों से भूख. जिसने ये बात समझ ली और व्यर्थ के विस्तार को छोड़ दिया, उसे परम तृप्ति का स्वाद आता है. यही तृप्ति समृद्धि कहलाती है.

ऐसे में इसे न सभ्यता कह सकते हैं और न संस्कृति. क्योंकि इसमें न प्रेम है और न ही प्रार्थना. इसमें सब दिखावा है. खेत-खलिहान सूखे पड़े हुए हैं और दरबार में रौशनी है. लोग तलवारें लिए खड़े हैं और सम्राट हीरे-जवाहरातों के सिंघासन पर बैठा है. इधर आदमी की बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं हो रहीं. कोई ज़्यादा खाकर बीमार है तो कोई भूख से बीमार है. कुछ इसलिए बीमार हैं कि उनके पास इतना ज़्यादा है कि वे जानते नहीं कि इसका करें क्या? इसे सभ्यता नहीं, असभ्यता कहते हैं.

संस्कृति तो तब पैदा होगी जब लोग तृप्त होंगे और लोगों के पास जीवन बचेगा. अभी जो कुछ बचता है, वो युद्ध में चला जाता है. युद्ध संस्कृति नहीं, एक भयानक रोग है. लेकिन अगर हम लाओत्से को सुनें, महापुरुषों को सुनें, तो दूसरी जीवन-व्यवस्था पैदा की जा सकती है. इस व्यवस्था का आधार ये होगा कि हम गैर-ज़रुरतों को छाटें और कम-से-कम में एक आदर्श जीवन जीने का प्रयास करें और अपनी ऊर्जा को बचाएं. उस ऊर्जा को सृजन में, संगीत में, समाधि में लगा सकते हैं जो उसे परमात्मा तक ले जा सकती है.

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