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जानिए एक ऐसे भारतीय की कहानी जिसने अमेरिका में बसा दिया हजारों एकड़ में फैला शहर

भारत में आध्यात्मिक गुरुओं का विवादों से काफी पुराना रिश्ता रहा है। बीते एक दशक की बात की जाए तो इस दौरान राम रहीम, आसाराम बापू व निर्मल बाबा जैसे कई कथित आध्यात्मिक गुरुओं को लेकर भारतीय जनता से लेकर भारतीय सत्ता तक में गर्माहट देखी जा चुकी है। इन आध्यात्मिक गुरुओं के प्रति देश की भोली जनता की श्रद्धा भी देखते ही बनती है। खुले दिल से लुटाए गए चंदे की बदौलत फरेबी बाबाओं की दुकान देखते ही देखते नोट छापने की मशीन के रूप में बदल जाती है।

आज से कुछ दशक पहले की बात की जाए तो एक भारतीय आध्यात्मिक गुरू ने अमेरिकी मीडिया में काफी सुर्खियां बटोरी थी। उस आध्यात्मिक गुरू को अनुयायी भगवान रजनीश, ओशो या सिर्फ भगवान के नाम से जानते थे। ओशो को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे विवादास्पद आध्यात्मिक गुरुओं की सूची में ऊपरी स्थान दिया जा सकता है। सेक्स जैसे विषयों पर अपने खुले विचारों को बेबाकी के साथ दुनिया के सामने पेश किए जाने की वजह से ओशो के लिए ‘सेक्स गुरू’ जैसे शब्दों का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया था। ओशो को रोल्स रॉयस कारों का भी बेहद शौक था। विभिन्न रिपोर्ट्स में किए गए दावों के अनुसार ओशो के पास कुल 98 रोल्स रॉयस कारें थी।

 

11 दिसंबर, 1931 को भारत के मध्यप्रदेश राज्य में चंद्र मोहन जैन के रूप में जन्म लेने वाले ओशो के अनुयाइयों में विदेशियों की संख्या काफी अधिक थी। 1980 के दशक की शुरुआत में भारतीय मीडिया व सरकार के द्वारा ओशो के विचारों को चुनौती दिए जाने के बाद उन्होनें अपना आश्रम पूना से अमेरिका स्थानांतरित किए जाने की योजना बनाई। अमेरिकी लोगों के अलावा वहां की सरकार को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि आने वाले कुछ सालों में इस भारतीय आध्यात्मिक गुरू के नाम खुद का एक शहर भी होगा, जिसे वे रजनीशपुरम के नाम से जानेंगे।

 

 

रजनीशपुरम के निर्माण के लिए ऑरेगोन प्रांत के मध्य में करीब 65 हजार एकड़ जमीन का चुनाव किया गया था। इस दुर्गम और वीरान जगह को पूर्व में बिग मडी रैंच के नाम से जाना जाता था।


 

साल 1981 में शहर के निर्माण के लिए यह जमीन 5.75 मिलियन डॉलर की कीमत में खरीदी गई थी। मौजूदा अर्थव्यवस्था के हिसाब से वर्तमान में यह कीमत 16 मिलियन डॉलर के करीब होगी।

 

 

महज तीन सालों के भीतर यह वीरान इलाका एक भरे-पूरे शहर के रूप में विकसित हो चुका था। इस शहर में भगवान रजनीश के अनुयाई रहा करते थे, जिन्हें रजनीशीस के नाम से जाना जाता था।

 

 

ओशो के इस अपने शहर में फायर ब्रिगेड, रेस्टोरेंट, पुलिस स्टेशन, मॉल व कम्युनिटी हॉल जैसी सभी आधारभूत व आधुनिक सुविधाएं मौजूद थीं।

 

 

भारत की तरह अमेरिका में भी रजनीश व उनके अनुयाई सरकार व स्थानीय लोगों के निशाने में आने लगे थे। कई हिंसक गतिविधियों के सामने आने के बाद से स्थानीय प्रशासन ने रजनीशपुरम के खिलाफ कानूनी जंग का ऐलान भी कर दिया था।

 

 

सरकार के लगातार बढ़ते दबाव व कई गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त होने के इल्जामों के बीच ओशो ने साल 1986 में अमेरिकी धरती छोड़ वापस भारत आने का फैसला कर लिया।

 

 

ओशो के शहर रजनीशपुरम को आगे चलकर एक ईसाई युवा कैंप आर्गेनाईजेशन को दे दिया गया। इस जगह को अब वाशिंगटन फैमिली रैंच के तौर पर जाना जाता है।

 

 

19 जनवरी, 1990 को पुणे स्थित आश्रम में ओशो ने अपनी आखिरी सांसें ली, उस समय उनकी उम्र 58 साल थी। इस तरह भारत समेत अमेरिकी इतिहास के सबसे विवादास्पद धर्मगुरु की ज़िन्दगी तमाम उतार-चढ़ावों के बीच समाप्त हो गई।