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गगोल गाँव का 1857 क्रांति में बलिदान – आज तक जिन्दा है प्राचीन​ पीपल का पेड़ जिस पर लटकाए थे अंग्रेजों ने स्वतंत्रता ​सेनानी ​

गगोल गाँव

10 मई 1857 की रात को अंग्रेजों ने कसम खाई थी कि वह अब उन गाँवों और उन लोगों को नहीं छोड़ने वाले हैं जिन्होंने  क्रान्ति के अंदर अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था.

मेरठ उस समयअंग्रेजों की आँख में इसलिए चुभ रहा था क्योकि मेरठ के अंदर 1857 की क्रांति का जो उबाल था उसे देख एक बार को अंग्रेज भी घबरा गये थे.

मेरठ के कुछ 6 मील के आसपास तक के गाँवों ने अंग्रेजों के होश उड़ा दिए थे.

खासकर गगोल गाँव के लोगों ने जो संघर्ष किया था तो उसे देखकर अंग्रेजों को भी पीछे हटना पड़ा था.

आप अगर गगोल गाँव का इतिहास पढेंगे तो मालूम चलेगा कि यही गगोल गाँव वह स्थान है जहाँ प्राचीन समय में ऋषि विश्वामित्र तप करने के लिए बैठे थे. 3 जून 1857 की रात गगोल गाँव केआसपास के सभी रास्ते रोक दिए गये थे. वैसे अंग्रेजी दस्तावेजों से यह साफ़ भी हुआ है कि 10 मई 1857 की रात को जब क्रांतिकारी कोतवाल धनसिंह गुर्जर ने गगोल गाँव के लोगों को क्रांति के लिएबुलाया था तो यह गाँव वाले भारी संख्या में अपने क्रांतिकारी भाई के पास गये थे और उस रात को इन लोगों ने कैंट और सदर में भारी तबाही मचाई थी. साथ ही साथ इन लोगों ने अंग्रेजी जेल तोड़करकुछ 839 अपने साथियों को जेल से आजाद कराया था.

आपको बता दें कि यहाँ हम तो बोल रहे हैं कि इन क्रांतिकारियों ने अपने साथियों को आजाद कराया था लेकिन तब अंग्रेजों ने लिए यह क्रांति नहीं बल्कि विद्रोह था और यही कारण था कि जून के शुरूआती दिनों में ही अंग्रेज गगोल गाँव पर इतनी बड़ी कार्यवाही करने यहाँ जुट रहे थे. 

पहली कार्यवाही में भाग गये थे सभी क्रांतिकारी

3 जून को अंग्रेजी सेना अपने साथ भारी संख्या में हथियार लेकर गाँव तक आ पहुची थी.

उस समय सेना की कमान कोतवाल बिशन सिंह के हाथों में थी और यह बात गाँव वालों के हक़ में गयी थी. अंग्रेजी सेना भारी मशीन गन्स के साथ यहाँ आई थी और कोतवाल सिंह सेना को लीड करने के लिए देर से आये थे और इसी का फायदा उठाकर गाँव वाले भागने में सफल रहे थे. लेकिन तब सभी जान गये थे कि अब अंग्रेजों से बचकर भागना ज्यादा दिनों तक नहीं हो पायेगा.

गाँव को सेना ने घेर लिया था और आसपास के बॉर्डर पर सेना लगी हुई थी.

कुछ दिनों के बाद अंग्रेजी सेना ने एक बार फिर से गाँव पर हमला किया और इस बार क्रांतिकारियों की किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया. गाँव में मासूम बच्चे और महिलाओं की जान ना जाएँ इसलिए गाँव के मर्दों ने आत्मसमर्पण करना शुरू कर दिया था. अंग्रेजों से विद्रोह और लूट के आरोप में 9 लोग रामसहाय, घसीटा सिंह, रम्मन सिंह, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, कढेरा सिंह, शिब्बा सिंह बैरम औरदरबा सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया था. बाद में अंग्रेजी कोर्ट ने इन क्रान्तिवीरों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया था. दशहरे के दिन इन 9 क्रान्तिकारियों को चौराहे पर लटकाकर सबके सामने फांसीदे दी गयी थी. ऐसा भी बताया जाता है कि जिस पेड़ से लटकाकर इन लोगों को फांसी दी गयी थी वह पेड़ आज भी हरा है और इस पेड़ पर वह क्रांतिकारी आत्मायें आज भी वास करती हैं.

गगोल गाँव में आज भी दशहरा इसलिए नहीं मनाया जाता है क्योकि 1857 में दशहरे के दिन ही इन लोगों को फ़ासी पर लटका दिया गया था.

भारत देश को आजादी के लिए कितना बलिदान देना पड़ा है यह बात आप तभी समझ पायेंगे जब आप गाँव-गाँव घूमकर इन लोगों इतिहास को अपनी आँखों से देखेंगे.

अन्यथा किताबे पढ़कर आप सदाएक ही परिवार के गुणगान गाते रहेंगे.

(इस बलिदान की सत्यता जांचने के लिए आपको लेखक आचार्य दीपांकर की पुस्तक स्वाधीनता संग्राम और मेरठ, को जल्द से जल्द खरीदकर पढ़ना शुरू कर देना चाहिए.) 

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