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मुस्लिम भी कहते थे इसे ‘हिन्दू-स्थान’ लेकिन फिर हुआ हिन्दुस्तान, जिसे अब इंडिया कहते हैं, भारत के नामकरण की पूरी कहानी

the story of naming india

भारत विश्व का एक प्राचीनतम देश है.

इस देश में जो भी आया उसने एक अलग नाम से ही देश को पुकारा.

जैसे कि हम सभी जानते हैं कि देश में लोग व्यापार के मकसद से आते थे. अफगानिस्तान से लेकर इंग्लैंड तक सभी लोग यहाँ सामान खरीदने और बेचने समुद्र के रास्ते आते थे.

इस बात के इतिहास में पक्के सबूत हैं कि इस देश का एक नाम ’हिन्दू-स्थान’ भी था. प्रारंभ में सभी व्यापारी लोग देश को हिन्दुओं का स्थान ही मानते थे जहाँ सिर्फ और सिर्फ हिन्दू लोग रहते हैं. कालांतर में हिमालय से इंदु महासरोवर फैले इस देश का नाम हिमालय का ‘हि’ लेकर और इंदु महासरोवर का ‘इंदु’ जिसे ‘हिन्दू’ बतलाया और इस देश का नाम हिन्दुस्थान रखा गया था.

यहाँ तक कि बोला जाता है कि समस्त मुस्लिम शासकों के समय में भी यह देश इसी नाम से अधिक विख्यात था और सभी इसको हिन्दुस्थान ही बुलाते थे.

प्राचीन शास्त्रों में देश का नाम

प्राचीन ग्रंथों में हमारे देश का नाम भारतवर्ष और भारत ही अधिक लिखा गया है. प्रथम जैन तीर्थ गुरु ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम से कुछ विद्वान इसे भारतवर्ष कहते थे तो वहीँ दूसरी तरफ राजा दुष्यंत के वीर पुत्र भरत के नाम से भारत मानते हैं.  शास्त्रों और ग्रंथों में इन्हीं दो नामों का जिक्र हुआ है. लेकिन अब विदेशी शासक संस्कृत बहुत अच्छी नहीं पढ़ पाने के कारण इन नामों से ज्यादा परिचित नहीं हुए. मुस्लिम शासकों को आसानी होती थी हिन्दुस्थान बोलने में इसलिए यह नाम आम हो गया था.

अंग्रजों का आगमन

अब जब अंग्रेज देश में आये तो उनको हिन्दुस्थान और हिन्दुस्तान दोनों ही नामों को पुकारने में बड़ी दिक्कत हो रही थी. तो इसलिए एक नया नाम खोजा गया जो इंडिया था. लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान में भी ‘इंडिया दैट इज भारत ‘ कहा गया है.

विश्व में अकेला हमारा ही देश है जिसे इतने नामों से पुकारा जाता है. कोई इसे आर्यवर्त तो कोई आर्यभूमि, कई बार देश को पृथ्वी भी बोला गया है. लेकिन यह हमारा बड़प्पन है, हमारे संस्कार हैं कि इस देश ने सभी नामों को बिना वाद-विवाद के ही स्वीकार कर लिए. जिसको जो बोलने में सुविधा हुई उसने उसी नाम से देश को पुकारा है.

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