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मुफ़्त की शराब दे दो और कुछ भी करवा लो!

drunkard

जी नहीं, आपको मुफ़्त की शराब नहीं दी जा रही यह पढ़ने के लिए!

पर सोच के मज़ा आ रहा है ना कि मुफ़्त की शराब मिल जाए तो हिमालय चढ़ जायेंगे, है ना?

यही हाल आधे देशवासियों का है दोस्तों!

शराब का नाम सुनते ही मुँह में पानी आने लगता है, पापड़-चख्ने के सपने आने लगते हैं और सातवें आसमान पर पहुँचने को जी ललचाने लगता है| फिर क्या, फटेहाल हालात हों या जेब नोटों से भरी हो, दारू पीने के लिए गिलास भी निकल आता है, बर्फ़ का इंतज़ाम भी हो जाता है और साथ देने के लिए दोस्तों का जमघट भी लग जाता है|

बस इसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया जाता है!

नेता वोट के बदले दारु की बोतलें बाँटते हैं तो वहीँ भ्रष्ट अध्यापकों से पेपर लीक करवाना हो तो एक पूरी बोतल जादू की छड़ी बन जाती है| दवाई बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियां अक्सर डॉक्टरों को मुफ़्त की दारु पिलाने का इंतज़ाम करती हैं ताकि उनकी दवाईयों की बिक्री बढ़ सके तो वहीँ बड़े रेस्टोरेंट मुहूर्त के समय मेहमानों को मुफ़्त की शराब का लालच देकर आमंत्रित करते हैं!

आख़िर शराब और मुफ़्त की शराब में फ़र्क क्या है?

नशा तो दोनों से ही होना है|

और एक दिन अगर मुफ़्त की पी भी ली, तो एक रात ही नशा रहेगा, अगले दिन सुबह तो फिर होशो-हवास वापस! तब क्या?

उस वक़्त जो मुफ़्त की दारू पीने के बदले अपने ज़मीर को मुफ़्त में ही बेच दिया था, क्या वो वापस आ जाएगा?

मुफ़्त के नशे में जो गलत काम किये थे, क्या वो सही हो जायेंगे? टल्ली होकर जो ड्रामा किया था, उस से पीछा छुड़ा पायेंगे?

अधिकतर दंगे थोड़े से पैसों और मुफ़्त की शराब के लिए किये जाते हैं! २००-५०० की शराब के लिए इंसान को ख़रीदा-बेचा जाता है मानों इंसान नहीं कोई देसी ठर्रे की बोतल हो जिसका जब तक चाहा इस्तेमाल किया और फिर बेच दिया कौड़ियों के दाम या फिर सड़क पर फ़ेंक दिया पाओं की ठोकर बनने को!

वैसे तो यही कहना सही होगा कि शराब से बचो, लेकिन अगर यह ज़्यादा मुश्किल है तो कम से कम कोशिश कीजिये कि मुफ़्त की शराब के फंदे में मत पड़िए!

सिर्फ़ एक दिन मिलती है मुफ़्त की, बाकी दिन आपकी आत्मा को चूस के पी जाती है! यक़ीनन आपकी आत्मा की कीमत चिल्लर जितनी तो नहीं है!

सोचियेगा!

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