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मंदिर-मस्जिद में महिलाओं के बराबरी के हक के लिए इन महिलाओं ने लड़ी लंबी लड़ाई

मंदिर मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की लड़ाई

मंदिर मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की लड़ाई – सुप्रीम कोर्ट के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की इजाजत देने के बाद आज पहली बार शाम को मंदिर के कपाट खुलेंगे, लेकिन कोर्ट के आदेश के बावजूद मंदिर प्रशासन और भगवान अयप्पा के भक्त महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने का विरोध कर रहे हैं और उन्हों रोकने की पूरी कोशिश की जा रही है.

उधर बड़ी संख्या में महिलाएं मंदिर में प्रवेश का इंतज़ार कर रही हैं, जिससे इलाके में तनाव बढ़ गया है.

हमारे देश में अजीब विरोधाभास है एक तरफ तो देवी मां की पूजा की जाती है, तो दूसरी ओर देवी का रूप महिलाओं को ही भगवान के पूजा के हक से महरूम रखा जाता है. देश में कई ऐसे मंदिर और मस्जिद हैं जहां महिलाओं की एंट्री बैन हैं.

कुछ पर लगा बैन हट चुका है और ये हुआ है उन चंद महिलाओं की बदौलत जिन्होंने बराबरी के हक के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है. आज आपको कुछ ऐसी ही महिलाओं के बारे में बताने जा रहे हैं.

मंदिर मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की लड़ाई –

तृप्ति देसाई और सबरीमाला की लड़ाई

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश दिलाने और पूजा करने की इजाजत मिलने के पीछे सबसे अहम योगदान समाजसेवी तृप्ति देसाई का है. इन्होंने ही मंदिर में महिलाओं के बैन के खिलाफ आवाज़ उठाई. कई बार धमकियां मिलने के बाद भी उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे और आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगा बैन हटा दिया.

शन शिंगणापुर

महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश दिलाने के पीछे तृप्ति का बहुत बड़ा योगदान रहा. भूमाता ब्रिगेट उनकी ही संस्था है. तृप्ति समाजसेवी अन्ना हजारे के साथ कई सामाजिक कार्यों में हिस्सा ले चुकी हैं. उन्होंने इससे पहले नासिक के त्रयंबकेश्वर, कपालेश्वर मंदिर और कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर में महिलाओं को प्रवेश दिलाने के लिए आंदोलन किया था. पुणे के खेड तहसील के कनेरसर के यमाई देवी के मंदिर के खास हिस्से में पुरुषों के प्रवेश पर पाबंदी के खिलाफ भी वह लड़ाई लड़ चुकी हैं.

सफिया नियाज, जकिया सोमन और हाजी अली दरगाह

मुंबई के मशहूर हाजी अली दरगाह में साल 2016 से पहले महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी. दरगाह में महिलाएं प्रवेश पा सकें, इसके लिए समाजसेविका नूरजहां सफिया नियाज ने लंबी लड़ी. नियाज ने अगस्त 2014 में बॉम्बे हाई कोर्ट में इसकी याचिका दायर की. इस काम में जाकिया सोमन भी उनके साथ थीं. आखिरकार 26 अगस्त 2016 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ट्रस्ट की ओर से दरगाह के भीतरी गर्भगृह में प्रवेश पर पाबंदी को गैरजरूरी माना और बैन हटा लिया. अब महिलाएं दरगाह में चादर चढ़ा सकती हैं.

मंदिर मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की लड़ाई – आज के इस आधुनिक युग में भी कई धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है, जो वाकई शर्मनाक है.

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