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एकादशी का व्रत – भगवान कृष्ण की प्रसन्नता प्राप्त कराने वाला व्रत माना जाता है

एकादशी तिथि
प्रतिपदा से लेकर पूनम तक पंद्रह तिथियां शुक्ल पक्ष की होती है।
पुन: प्रतिपदा से लेकर अमावस्य तक पंद्रह तिथियां कृष्ण पक्ष की होती है।
इन दाेनों पक्षों को  मिलाकर एक माह होता है। इन तिथियों के एक-एक स्वामी भी होते है।
इन दो पक्षो में दो बार एकादशी तिथि आती है। जिसक स्वामी विश्वेदेव होते है। इस तिथि पर व्रत करने का बड़ा महत्व हमोर शास्त्रों मे ंवर्णीत है। इन दिन अन्न का सेवन करना तो क्या दर्शन करना भी  निषेध माना गया है। इसी को एकादशी तिथि का व्रत या ग्यारस का व्रत कहते हे। यह व्रत बड़ा पवित्र माना गया है। भगवान कृष्ण की प्रसन्नता प्राप्त कराने वाला इसको माना जाता है।
शरीर में शास्त्रों के अनुसार पांच ज्ञान की -आंखे, कान, नाक, त्वचा, जिह्वा एवं पांच कर्म की हाथ, पैर, मुंह, गुदा एवं मूत्र द्वार यह दस इन्द्रियां बताई गई है। इसके अलावा एक होता है मन इस तरह दस इन्द्रिय एवं एक मन मिलाकर ग्यारहों पर नियंत्रण करने के लिए ही एकादशी तिथि का व्रत किया जाता है।
इस एकादशी तिथि के स्वामी विश्वेदेवा होते है। श्रीकृष्ण से संबंधीत कथाएं सुनने एवं उनके दर्शन करने से इस व्रत में बड़ा लाभ होता है।  इस व्रत का प्रांरभ एक दिन पूर्व शाम से ही आरंभ हो जाता है। दशमी तिथि की शाम को कुछ भी भोजन ग्रहण नही  किया जाता । अगले  दिन सुबह जल्दी उठकर भगवान श्रीकृ़ष्ण का विधि पूर्वक पूजनकर व्रत का  नियम लिया जाता है।
इस दिन किसी भी प्रकार के अन्न का सेवन त्याग करना होता है।
अगले दिन द्वादशी तिथि को सुबह ब्राह्मण को भोजन करा कर पूर्णत: संतुष्ट कर फिर आहार ग्रहण  किया जाता है।

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