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जानिए चीन के अधिकारी गुपचुप तरीके से क्यों कर रहे हैं दलाई लामा की मदद !

दलाई लामा

इस खबर को जिस किसी ने भी पढ़ा वह पढ़कर कुछ देर के लिए दंग रह गया.

क्या कम्युनिस्ट चीन में कोई व्यक्ति ऐसी हिमाकत कर सकता है कि वह चीन की सरकार को भरोसे में लिए बिना उसके कट्टर दुश्मन को मदद करे.

विश्वास तो नहीं लेकिन ये खबर सच है. भारत में निर्वासन का जीवन जी रहे तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को चीन की सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ अधिकारी मदद कर रहे हैं.

इस खबर का खुलासा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने ही किया. ऐसा पहली बार हुआ है जब चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया कि उसके कुछ अधिकारी निर्वासित तिब्बती धर्मगुरु को चंदा देकर उनकी मदद कर रहे हैं.

इस खबर को लेकर दुनिया भर में कयासों का दौर शुरू हो गया है.

क्योंकि ऐसा पहली बार सरकारी मीडिया ने 1959 में दलाई लामा के भारत चले जाने के बाद चीनी अधिकारियों के तार उनसे जुड़े होने की बात का खुलासा किया है. बल्कि यहां तक कहा है कि ये संगठन दलाई लामा के लोगों को खुफिया जानकारी देते हैं और चीन में अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं.

आपको बता दें कि चीन भारत में रह रहे दलाई लामा को तिब्बत को चीन से अलग करने के लिए काम करने वाले अलगाववादी के तौर पर देखता है.

इतना ही नहीं उन्होंने आगे यह भी कहा है कि ये लोग ऐसा कर यहां अलगाववादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं.

आखिर क्या कारण है कि चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने ऐसी खबर को छापा है. इसके पीछे उसका क्या मकसद है.

क्योंकि इस खबर को पढ़ने के बाद लगता है कि वहां सरकार के भीतर दो गुट है. जिनके भीतर विचारों का संघर्ष चल रहा है. ऐसा तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में अनुशासन निरीक्षण विभाग के प्रमुख वांग योंगजुन के हवाले से अखबार को दिए गए बयान से लगता है.

जिसमें लिखा कि पार्टी के कुछ अधिकारियों ने महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दों को और देश के अलगाववाद-रोधी संघर्ष को दरकिनार कर दिया है. क्योंकि जिस प्रकार चीन के अधिकारी चोरी छिपे 14वें दलाई लामा को कथित तौर पर चंदा दे रहे हैं, वह पार्टी के भीतर तिब्बत और दलाई लामा को लेकर फूट को दर्शाता है.

संभव है कि कम्युनिस्ट चीन में एक धड़ा ऐसा हो जो दलाई लामा को मदद देकर पर्दे के पीछे से चीनी सरकार के विरोध में कोई गुप्त एजेंडा चला रहा हों. ताकि इसके जरिए राजनीति में अपना वर्चस्व कायम रखा जा सके.

गौरतलब हो कि सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) से जुड़े अखबार ग्लोबल टाइम्स ने 2016 में जारी एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया है जिसमें 2014 में पार्टी के 15 अधिकारियों के तार कथित तौर पर अवैध विदेशी अलगाववादी संगठनों से जुड़े होने की बात कही गई थी.