ENG | HINDI

पीतल के बर्तन के फायदे जानकर छोड़ देंगे स्टील के बर्तन में खाना !

पीतल के बर्तन

पीतल के बर्तन – आजकल लोग घरों में खाने के लिए आमतौर पर स्टील, प्लास्टिक या कांच के बर्तनों का ही इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि ये ट्रेंडी दिखने के साथ ही सस्ते भी होते है.

पीतल के बर्तन का उपयोग सिर्फ पूजा-पाठ के लिए होता है, क्योंकि पीतल काफी महंगा मिलता है.

मगर पुराने ज़माने में लोग स्टील के बर्तनों की बजाय पीतल के बर्तनों का ही उपयोग करते थे. ऐसा नहीं था कि वो बहुत अमीर थे इसलिए ऐसा करते थे, बल्कि पीतल न सिर्फ सेहत के लिए, बल्कि हर लिहाज़ से शुभ और अच्छा माना जाता है, इसलिए पुराने ज़माने में लोग पीतल के बर्तन का उपयोग करते थे.

पीतल के बर्तन

पीतल के बर्तन के फायदे जानकर शायद आप भी अगली बार बाज़ार से यही खरीद लाएंगे.

1 – सेहत की दृष्टि से पीतल के बर्तनों में बना भोजन स्वादिष्ट होने के साथ ही संतुष्टी भी देता है. इससे बीमारियां तो दूर होती है साथ ही ये शरीर को ऊर्जी भी देता है. पीतल का बर्तन जल्दी गर्म होता है जिससे गैस तथा अन्य ऊर्जा की बचत होती है. पीतल का बर्तन दूसरे बर्तन से ज्यादा मजबूत है. पीतल के कलश में रखा जल अत्यधिक ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होता है.

2 – पीतल पीले रंग का होने से हमारी आंखों के लिए टॉनिक का काम करता है. पीतल का उपयोग थाली, कटोरे, गिलास, लोटे, गगरे, हंडे, देवताओं की मूर्तियां व सिंहासन, घंटे, अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र, ताले, पानी की टोंटियां, मकानों में लगने वाले सामान और गरीबों के लिए गहने बनाने में होता है.

3 – ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सुवर्ण व पीतल की ही तरह पीला रंग देवगुरु बृहस्पति को संबोधित करता है और पीतल पर देवगुरु बृहस्पति का आधिपत्य होता है. बृहस्पति ग्रह की शांति के लिए पीतल का उपयोग किया जाता है, जो कि बेहद फायदेमंद होता है.

4 – वैवाहिक कार्य में वेदी पढ़ने हेतु व कन्यादान के समय पीतल का कलश प्रयोग किया जाता है. शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के लिए भी पीतल के कलश का इस्तेमाल किया जाता है तथा बगलामुखी देवी के अनुष्ठानों में मात्र पीतल के बर्तन ही प्रयोग लिए जाते हैं. इन सभी कार्यों के लिए पीतल का अत्यंत महत्व है.

5 – मान्यताओं के अनुसार लड़के के जन्म पर नाल छेदन करने के बाद पीतल की थाली तो छुरी से पीटा जाता है. ऐसी मान्यता है कि इससे पितृगण को सूचित किया जाता है कि आपके कुल में जल और पिंडदान करने वाले वंशज का जन्म हो चुका है. मृत्यु के बाद अंत्येष्टि क्रिया के 10वें दिन अस्थि विसर्जन के उपरांत नारायणवली व पीपल पर पितृ जलां‍जलि मात्र पीतल कलश से दी जाती है. मृत्यु संस्कार के अंत में 12वें दिन त्रिपिंडी श्राद्ध व पिंडदान के बाद 12वीं के शुद्धि हवन व गंगा प्रसादी से पहले पीतल के कलश में सोने का टुकड़ा व गंगा जल भरकर पूरे घर को पवित्र किया जाता है.

 पीतल के बर्तन

हिंदू धर्म में तांबे व पीतल को बहुत शुभ धातु माना गया है, तभी दो देवी-देवताओं की मूर्ति से लेकर दिया और पूजा के अन्य बर्तन भी पीतल से ही बनाए जाते हैं. तो अगली बार आप भी अपने घर में पीतल के बर्तन ज़रूर ले आएं.