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ये तथ्य बताते हैं न तो एनकाउंटर फर्जी था और न ही कोई साजिश

आतंकियों का एनकाउंटर

न तो आतंकियों का एनकाउंटर फर्जी था और न ही जेल से भगाने के पीछे कोई साजिश।

सिमी आतंकियों के जिन सियासी अब्बाओं को लग रहा है कि आतंकियों का एनकाउंटर फर्जी था और मारे गए आतंकी मासूम थे और उनको एक साजिश के तहत जेल से भगाकर मारा गया है वो एक बार जरा उनकी हिस्ट्री खंगाल ले और इन तथ्यों को गौर से पढ़ ले।

समझ में आ जाएगा कि फर्जी एनकाउटंर और असली एनकाउंटर में क्या अंतर होता है।

आतंकियों का एनकाउंटर –

1 – जिस वीडियों को लेकर हाय तौबा मचाई जा रही है उसमें यह साबित नहीं होता कि एनकाउंटर फर्जी है। एनकाउंटर के बाद अक्सर पुलिस आतंकी या अपराधी के नजदीक जाने से पहले इस प्रकार गोली मारकर यह कन्फर्म करती है कि कहीं आतकी मरने का नाटक तो नहीं कर रहा। कभी वह जिंदा हो और नजदीक जाते ही हमला कर दे। जिसको प्वाइंट ब्लैंक रेंज की संज्ञा दी जा रही है वह आतंकी की तलाशी से पहले मौत कन्फर्म करने के लिए अक्सर पुलिस और सेना करती है।

2 – आतंकियों के शव पास पास पड़े होने से भी यह पुष्ट नहीं होता है कि सबको एक साथ बांध कर मारा गया है। अगर आप एनकाउंटर की वीडियों को देखेंगे तो उसमें साफ पता चल जाएगा कि पहाड़ी पर चढ़ेे जो 8 सिमी आतंकी नजर आ रहे हैं वे सभी एक साथ खड़े हैं। पुलिस को ललकारते आतंकी जब साथ साथ खड़े हैं तो मारे भी साथ जाएंगे।

3 – यह कहना कि एक साजिश के तहत इन्हें जेल से भगाया गया है उसमें कोई दम नहीं हैं। जो आतंकी पेशी पर जज को गाली देते थे और कोर्ट परिसर में नारेबाजी करते थे। वे इतने मासूम थे कि जेल से रात में निकाले जाने का मतलब नहीं समझते और शोर नहीं मचाते। क्योंकि सिमी के बाकी आतंकी भी तो उसी जेल में पास की बैरकों में बदं थे।

4 – अगर पुलिस ने इन आतंकियों को जेल से भागा दिखाकर एनकाउंटर में मारना होता तो पुलिस इनको जेल से भागा बताने के 9 घंटे बाद नहीं मारती बल्कि इनको कुछ दिन गायब रखती और फिर इनको किसी सूनसान जगह पर ले जाकर रात में या अल सुबह में इनका एनकाउंटर दिखाती।

5 – अगर आतंकियों के सियासी अब्बा थोड़ी से भी बुद्धि रखते होते तो उनको आसानी ये बात समझ में आ जाती कि आतंकियों खुले पहाड़ी मैदान में छोड़कर और गांव वालों की भीड़ जमाकर कभी लाइव फर्जी एनकाउंटर नहीं होते। और न ही जनता के सामने उनकी वीडियों रिकार्डिंग होती।

6 – यह कहना कि जेल से भागे आतंकियों के पास नए कपड़े और घड़ी कहां से आई बचकाना सवाल है। आज के समय में पेशी के दौरान पुलिस को चमका देने वाला छुटभैया अपराधी भी भागने से पहले सारे बंदोबस्त कर लेता है। फिर इनका तो पूरे देश में एक संगठित नेटवर्क है।

ये बातें है जो दर्शाती है कि आतंकियों का एनकाउंटर असली था फर्जी नहीं – यह कहने वाले कि पुलिस ने आतंकियों को जेल से निकालकर उनका फर्जी तरीके से एनकाउंटर किया आरोप के समर्थन में कोई ठोस तर्क नहीं दे पा रहे हैं। सिर्फ कुंठित मानसिकता के चलते आधारहीन सवालों को जन्म देकर अपनी राजनीति रोटियों सेक रहे हैं।

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