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अगर ऐसा न होता तो बकरी ईद पर बेटों की दी जाती कुर्बानी

बकरी ईद

सभी मुस्लिम देशों के साथ-साथ भारत में भी बकरी ईद मनाई जाती है। रमजान के बाद ईद-उल-फितर मनाई जाती है और इसके बाद ईद-उल-जुहा आती है जिसे बकरी ईद भी कहा जाता है। इस मौके पर मुस्लिम समाज के लोग नमाज़ अदा करते हैं और बकरों की कुर्बानी देते हैं।

ईस्‍लाम धर्म के अनुसार दुनिया में 1 लाख 24 हज़ार पैगंबर आए थे जिनमें से एक थे पैगंबर हजरत इब्र‍ाहिम। मुस्लिम धर्म में इन्‍होने ही बकरीद की शुरुआत की थी।

ऐसे हुई शुरुआत

जानकारी के मुताबिक हजरत इब्राहिम से एक बार अल्‍लाह ने सपने में आकर अपनी सबसे प्‍यारी चीज़ कुर्बान करने को कहा।

इब्राहिम को 80 साल की उम्र में औलाद का सुख नसीब हुआ था इसलिए उनके लिए उनका बेटा की उनकी सबसे प्‍यार चीज़ थी। इब्राहिम ने दिल पक्‍का कर अपने बेटे की बलि देने का निर्णय किया।

इब्राहिम को लगा कि वह अपने बेटे के प्रेम के कारण उसकी बलि नहीं दे पाएगा इसलिए उसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। जअ हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे ईस्‍माइल की गर्दन काटने के लिए छुरा चलाया तो अल्‍लाह के हुक्‍म पर ईस्‍माइल की जगह एक जानवर को रख दिया गया।

इब्राहिम ने जब अपनी आंखों से पट्टी हटाई तो उसे अपने बेटे को जिंदा देखकर बड़ी खुशी हुई। अल्‍लाह को हजरत इब्राहिम का ये अकीदा इतना पसंद आया कि उन्‍होंने हर साहिबे हैसियत पर कुर्बानी देना वाजिब कर दिया।

इस बात से ये संदेश मिलता है कि मुसलमान अपने धर्म के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर सकते हैं।

अगर उस समय हजरत इब्राहिम की छुरी अपने बेटे की गर्दन पर चल जाती तो आज लोग बकरी ईद के मौके पर बकरे की जगह अपने बेटे की बलि देने को मजबूर होते।

इस बात ये अल्‍लाह दुनिया को ये संदेश देना चाहते थे कि जीवन में सब कुछ कुर्बान करना पड़ता है।

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