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मुग़ल बादशाह अकबर की आस्था इस देवी पर आकर रुक गई ! जानिए कैसे !

माता ज्वाला का मंदिर

अकबर एक मुग़ल बादशाह थे, जो भारत में हिन्दू धर्म को मानने वालो से कर वसूल कर अपना राजकोष के धन में बढ़ोतरी करते थे.

अकबर मुग़ल होने के कारण इस्लामी धर्म को ज्यादा प्राथमिकता देता था और इस्लाम के प्रति पूर्णरूप से समर्पित थे.

लेकिन उनके जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी हुई जिसने इस मुग़ल बादशाह को हिन्दू धर्म मानने पर मजबूर कर दिया. अकबर की आस्था हिन्दू धर्म बढ़ने लगी. अकबर का सर हिन्दू गुरु, देवी देवताओं के सामने झुक गया.

माता ज्वाला का मंदिर

तो आइये जानते है आखिर अकबर की आस्था से हुआ क्या था.

  • हिमाचल प्रदेश के  कांगड़ा से लगभग 30 किमी दूर माता ज्वाला का मंदिर है. इस माता ज्वाला का मंदिर की खोज का श्रेय पांडवो को जाता है.
  • यह माता ज्वाला का मंदिर 51 शक्तिपीठ में से एक है. यहाँ माता सती का जीभ गिरा, जहाँ से इस ज्वाला देवी की उत्त्पति हुई. इस मंदिर में ज्वाला की ज्योत लगातार कई युग से जल रही है.
  • यहाँ और भी 9 ज्योति जलती है. आंधी, तुफान, भूचाल, कुछ भी आ जाये इस ज्वाला की ज्योत कभी बुझती ही नहीं.
  • कथानुसार अकबर का भारत का सम्राट हुआ करता था. एक दिन धयानू नामक भक्त अन्य 1000 भक्तों के साथ माता के दर्शन हेतु यात्रा करते हुए दिल्ली चांदनी चौक पहुंचा, जहाँ मुग़ल सैनिक ने  ध्यानु को उसके घोड़े सहित बंदी बना लिया और अकबर के समक्ष प्रस्तुत किया. तब ध्यानू ने अकबर को अपनी  माता  ज्वालामाई के दर्शन करने जाने की बात कही.
  • ज्वालामाई का नाम सुनकर अकबर ने ज्वालामाई के बारे में ध्यानू से सब सुना और माता की महिमा का गुणगान सुनते हुए कहा कि अगर तुम्हारी माता और बंदगी पाक होगी तो देवी तुम्हारा मान जरुर रखेगी. तुम्हारे घोड़े का सिर काट देते है. तुम अपनी माता से कह कर फिर से अपने घोड़े को जिन्दा करा लेना. यह कहते हुए घोड़े का सिर कटवा दिया.
  • इसके बाद ध्यानू ने बादशाह से प्रार्थना कर अपने घोड़े का सर एक माह के लिए सुरक्षित रखने की विनती की, जिसको बादशाह ने स्वीकार कर ली और धयानू को यात्रा पर जाने की अनुमति दे दी.
  • अनुमति पाकर ध्यानू अपने साथियों के साथ माता के दर्शन करने दरबार चला गया.
  • वहां माता से अपनी भक्ति का सन्मान रखने की प्रार्थना की. अपने प्रिय भक्त की प्रार्थना को स्वीकार कर माता ज्वाला ने  उसके घोड़े को जिन्दा कर दिया, जिसको देखकर अकबर हैरान रह गया और सेना के साथ खुद माता ज्वाला के  मंदिर चला गया.
  • वह उस ज्वाला ज्योत को बुझाने की हर कोशिश की. यहाँ तक नहर बनवाकर मंदिर में पानी भी भरवा दिया, लेकिन माता ज्वाला की ज्योत को बुझाने में नाकाम रहा.
  • अंत में हार मानकर माता ज्वाला के सामने सिर झुका लिया.
  • फिर माता पर पचास किलो के  सोने से बना छतर चढ़ाया. परन्तु उसका वह छतर माता ने स्वीकार नहीं किया और वह छतर गिरा कर अन्य धातु में  परिवर्तित कर दिया. वह छतर आज भी ज्वाला देवी के मंदिर में रखा हुआ है.

माता ने भले ही अकबर का चढ़ावा स्वीकार नहीं किया लेकिन अकबर माता ज्वाला का भक्त जरुर बन गया और हिन्दू धर्म की आस्था का सम्मान करने लगा.

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