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लॉन्ग ड्राइव वो भी समंदर किनारे, कैसा विचार है? अभी तो केवल समझौता हुआ है!

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भाग दौड़ की दिनचर्या में कुछ सुकून के पल हमें अपने प्रियजनों के साथ बिताने के लिए नहीं मिलते है.

ऊपर से हफ्ते में एक ही ऑफ़ होता है, उसमे आप कही बाहर घूमने कैसे जा सकते हो. एक छूट्टी में पर्सनल काम, कुछ घर के काम निपटाते हुए ही नाक में दम हो जाता है. ऐसे में छूट्टी को बेहतर करने के लिए लॉन्ग ड्राइव जैसा विकल्प बजेट में है और मिलेगा आपको अनमोल साथ आपके प्रियजनों का.

समंदर किनारे लॉन्ग ड्राइव कैसे ?

शहर के अंदर तो आप ने कई बार ड्राइव किया होगा. वाहनों से सफ़र किया होगा. किंतु समंदर किनारे कभी दूर तक ड्राइव नहीं किया होगा.

भले कुछ छोटे विकल्प कुछ शहरों में मौजूद है किन्तु असली मजा तो दूर तक ठंडी हवा में ड्राइव करने का है. मुंबई का सी लिंक भी एक अच्छा विकल्प है मगर फिर भी वो इतना लम्बा नहीं की आप किसी के साथ दूर तक जाओ.

मगर जल्द ही ये समस्या दूर होने वाली है. धीरे धीरे भारत के सभी तट पर आप लॉन्ग ड्राइव का मजा आप ले पाओगे.

कब लोग लॉगं ड्राइव का मजा ले पाएंगे?

फिलहाल महाराष्ट्र सरकार ने नीदरलैंड सरकार के साथ एक समझौता कर लिया है. इस में उत्तर और दक्षिण मुंबई के समुद्री तट और मेट्रो निर्माण को लेकर नीदरलैंड अपनी तकनीकी सलाह देगा. यह समझौता दोनों देशो के बीच हो चुका है.

मुंबई के समंदर तटों पर पहले सड़के बनाई जाएगी अगर ये योजना सफल हुई तो आगे पुरे भारत के समंदर तटों को विकसित किया जा सकता है.

क्या है प्रयोजन?

समंदर से सटी जमीन और इंफ्ररास्ट्राकचर के निर्माण में नीदरलैंड वैश्विक विशेषज्ञ है. यही एक वजह है जो महाराष्ट्र सरकार ने इस समझौते में नीदरलैंड से हाथ  मिलाया है.

कृषि खाद्य, फूलों की खेती, जैव प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, स्वास्थ्य के साथ ही बुनियादी ढांचे और जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी नीदरलैंड अपना सहयोग देने का वादा किया है.

महाराष्ट्र की शक्ल सूरत अंदर से बदलने का यह प्रयोजन सरकार का है. किंतु सरकार को यह भी सोचना होगा कि केवल विदेशी विशेषज्ञ की सलाह पर ही वो महाराष्ट्र व् मुंबई को जमीनी लेबल पर नहीं सुधार सकते है.

आ सकती है कई समस्या

पहली समस्या मुंबई में बना मोनो रेल भारत में पहली मोनो रेल सेवा है. यह रेल जबसे बनी है तब से विवादों में घिरी रहती है. तकनिकी समस्याओं से लेकर इस रेल में कई समस्या आए दिन होती रहती है.

सबसे बड़ी समस्या ये है जिस पर एमएमआरडीए अब तक संतुष्ट जवाब नहीं दे पाया. वो रेल का ट्रैक जिस खम्बो पर बना है उसके नीचे की जमीन उखड़ने लगी है. ये हालात निर्माण के कुछ दिन बाद से ही शुरू हो गये थे.

अब आप समझ सकते हो, जब यही के विशेषज्ञ अपनी जमीन को नहीं पहचान सकते है तो विदेशी कैसे समझेंगे.

दूसरी समस्या मुंबई में अब तक जहा भी मेट्रो बनी है उस जमीन पर रहने वाले सभी लोगों को घर नहीं मिला है. वो घर से बेघर हो चुके है, कुछ लोगों को मिला है तो कुछ अभी तक इस आस में है की आज नहीं तो कल सायद सरकार सुध ले ही ले. अगर मेट्रो अधिक विस्तारित हो रही है तो उन लोगों का क्या जिनके घर इसमें उजड़ जाएंगे. इसके बारे में सरकार को सोचना होगा. जिससे स्थायी लोगो को बेघर होने का डर और दर्द न झेलना पड़े. उनके बच्चो का स्कूल न छूटे. उनके जॉब पर भी आने जाने की सहूलियत का भी ख़याल रखा जाये.

तीसरी समस्या दक्षिण मुंबई के समंदर में शिवाजी स्मारक जल्द बनने वाला है. इस कारण मछवारे पहले से परेशान है. अब अगर समंदर किनारे सड़क बन जाएगी तो उन मछुवारो के घर के साथ उनका व्यावसाय काफी प्रभावित हो सकता है. जिससे उनकी रोजी रोटी की समस्या पर सवाल खड़ा हो जायेगा, अगर सरकार इसमें  आधुनिक डॉक और सारी चीज़े मुहईया भी कर देती है तो भी यह मछुवारो के हद के बहार की बात हो सकती है.

इन महत्वपूर्ण समस्या के साथ कई छोटी बड़ी और समस्या है जिनके बारे में सरकार को सोचना होगा.

जनता को सकारात्मक बदवाल और आधुनिकता चाहिए परंतु इसका मतलब यह नहीं कि लोगों के घर और व्यावसाय उजाड़ दो. प्रगति के नाम पर मंहगाई को जनता के सर पर पटक दो. दो वक़्त की रोटी के लिये दिन भर भाग दौड़ करने वाली गरीब जनता को मेट्रो का सपना दिखा कर उनके बच्चो के मुह से रोटी का निवाला न छिन जाए.