ENG | HINDI

मौत के वो आख़िरी पल मुमताज़ महल के लिए बहुत दर्दनाक थे

दुनिया के सात अजूबों मे शामिल ताज महल को शाहजहाँ ने अपनी प्यारी बेगम मुमताज़ महल की याद मे बनवाया था। भले ही शाहजहाँ अपनी इस बेगम इस बेपनाह मोहब्बत करते हों लेकिन मुमताज़ की मौत बहुत दर्दनाक थी। अपने 14वें बच्चे को जन्म देते समय ही मुमताज़ महल ने दम तोड़ दिया था। मुमताज़ 30 घंटे टाक प्रसव की पीड़ा मे तड़पती रही थी।

शाहजहाँ ने किया था मुमताज़ को मजबूर

ममी महल के लेखक अफसर अहमद ने अपनी किताब मे उन दर्दनाक पलों का वर्णन किया है। जब शाहजहाँ को दक्षिण भारत मे लोधी के विद्रोह को काबू करने जाना था तब वो अपने साथ गर्भवती मुमताज़ को भी ले गया। 787 किलोमीटर का ये सफर मुमताज़ को बहुत भारी पड़ा। थकान का असर मुमताज़ के गर्भ पर भी पड़ रहा था। 16 जून, 1631 को मुमताज़ को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई

उस समय शाहजहाँ विद्रोह को रोकने की रणनीति बना रहा था। मुमताज़ ने कई बार बुलावा भेजा लेकिन शाहजहाँ उस से मिलने नहीं आए। मंगवार की सुबह से बुधवार की आधी रात टाक दर्द से मुमताज़ बुरी तरह तड़पती रही। 30 घंटे की प्रसव पीड़ा के बाद मुमताज़ ने एक बेटी गौहर को जन्म दिया। बच्ची को जन्म देने के बाद मुमताज़ की हालत बिगड़ने लगी।

आख़िरी समय मे लिए 2 वादे

 

जब मुमताज़ अपनी आख़िरी साँसे गिन रही थी तब शाहजहाँ उसके पास पहुंचे और उस वक्त मुमताज़ ने शाहजहाँ से 2 वादे लिए। इनमे से एक वादा कभी शादी न करने का था और दूसरा वादा ऐसा मकबरा बनवाने का था जो बिलकुल अनोखा हो। सुबह होते ही मुमताज़ के प्राण निकल गए। उस समय मुमताज़ 40 साल की थीं।

5 कपड़ों मे लिपटा था शरीर

मुमताज़ की देखभाल करने वाली सती उन निसा ने उनके मृत शरीर को रुई के 5 कपड़ों मे लपेटा था। इस्लामिक हिदायतों के बावजूद महिलाएं शोक जताकर रोटी रहीं।

मुमताज़ की मौत से शाहजहाँ ही नहीं बल्कि पूरा बुरहानपुर गम क सागर मे डूब गया था। किले की दीवारें औरतों के रोने की आवाज़ों से भर गईं थीं। मुमताज़ के शव को तप्ति नदी के किनारे जैनाबाद मे जमानती पर दफन कर दिया गया। मौत के 12 साल बाद शव को आग्रा के ताज माहल मे दोबारा दफनाया गया।

इस तरह दुनिया की सबसे प्यारी प्रेम कहानी का दुखद अंत हो गया। जन शाहजहाँ की मृत्यु हुई तो उसे भी मुमताज़ महल की कब्र के पास ही दफनाया गया। कुछ लोग इसे प्यार की निशानी कहते हैं तो कुछ इसे मकबरा मानते हैं।

कई लोगों का तो यहाँ tak कहना है कि ताज महल मुस्लिम मकबरा नहीं बल्कि हिंदुओं का शिव मंदिर है और सालों पहले यहाँ पर भगवान शिव कि पूजा हुआ करती थी।

आज भी इस बात को लेकर बहस छिड़ी रहती है कि ताज महल मुस्लिम मकबरा है या फिर हिंदुओं का शिव मंदिर।

सच चाहे जो भी हो हम तो बस इतना जानते हैं कि ताज माहाल बहुत खूबसूरत इमारत है और इसे दुनिया के सात अजूबों मे शामिल किया गया है जोकि भारत के लिए गर्व कि बात है।

Article Categories:
इतिहास

Don't Miss! random posts ..